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Sunday, 23 December 2012

सर्दी जुकाम से बचाव


आपकी जीवनशैली और आदतें कैसी भी हों कामन कोल्ड बहुत ही आम होने के कारण किसी भी मौसम में हो सकता है। इसलिए यह जानकारी थोड़ी अनोखी है कि कामन कोल्ड से निज़ात पाने का कोई शार्ट कट नहीं है चाहे आप कितनी भी दवाइयां या वैक्सीन लें।

कामन कोल्ड का संक्रमण थोड़ा डरावना होता है और इसके लक्षण जैसे खांसी, बुखार , सर्दी आपको दवाएं लेने के लिए प्रेरित करते हैं।

यह ध्यान देने योग्य बात है कि अगर आप कोई वैक्सीन नहीं ले रहे हैं तो आपको कामन कोल्ड के लक्षणों से बचना चाहिए। कामन कोल्ड से बचने के कुछ तरीके:

कामनकोल्ड से रोकथाम

हम सभी जानते हैं कि कामन कोल्ड संक्रमण से फैलने वाली बीमारी है और इसलिए ऐसे में हाथ धोना बहुत ज़रूरी है। समय समय पर हाथ धोना इसलिए भी ज़रूरी हो जाता है क्योंकि कामन कोल्ड से संक्रमित व्यक्ति के हाथों में अकसर वायरस चिपक जाते है जो फिर टेलिफोन, डेस्क, सेलफोन या डोरबेल पर चिपक जाते हैं। ऐसे कीटाणु स्वचालित तरीके से किसी दूसरे व्यक्ति में फैल सकते हैं।

पर्याप्त मात्रा में पेय लें:

कोल्ड जैसी परेशानी के समय पानी पीना थोड़ा मुश्किल होता है लेकिन पर्याप्त मात्रा में पानी पीने की कोशिश करें। विशेषज्ञों का ऐसा मानना है कि पानी से हमारा शरीर साफ हो जाता है और शरीर में मौजूद टाक्सिन निकल जाते हैं और रिहाइड्रेशन की क्रीया होती है ा चाय, काफी और सूप जैसे गरम आहार लेने से भी कोल्ड जैसी बीमारी से राहत मिलती है।

साफ और ताज़ा वायु लेना ज़रूरी है:

कामन कोल्ड से ग्रसित व्यक्ति के लिए घर की चारदीवारी के अंदर रहना समझदारी की बात है। लेकिन ऐसे में लोग यह भूल जाते हैं कि इस तरीके से कमरे के अंदर का नम माहौल कीटाणु के लिए स्टोरहाउस जैसा काम करता है। व्यक्ति को प्रतिदिन ताज़ी हवा लेना ज़रूरी होता है।

पेपेर की तौलिया का इस्तेमाल:

ऐसी सलाह दी जाती है कि हाथों को साफ करने के लिए किचन और बाथरूम में पेपर की तौलिया का इस्तेमाल करना चाहिए। घर में प्रत्येक सदस्य की अलग तौलिया होनी चाहिए जिससे कि कीटाणु ना फैलें।

बहुत ज़्यादा शराब पीने से प्रतीरक्षा प्रणाली का ह्रास:

विशेषज्ञ ऐसी सलाह देते हैं कि व्यक्ति को एक सीमित मात्रा मेंअल्कोहल का सेवन करना चाहिए क्योंकि इससे संक्रमण होने का अधिक खतरा रहता है। अल्कोहल शरीर में शुष्की पैदा करता है और इससे जर्मस आसानी से बढ़ जाते हैं।

अपने चेहरे को बार बार ना छूएं:

कोल्ड होने पर अपने चेहरे, नाक और मुंह को बार बार ना छूएं, क्‍योंकि ऐसे में अगर आपके आसपास किसी को कोल्ड हुआ हो तो आपको भी कोल्ड होने की सम्भावना बढ़ जाती है।

फाइटोकेमिकल्स फ्लू और कोल्ड से लड़ने में प्रभावी:

व्यक्ति को पर्याप्त मात्रा में कच्चे फल और सब्ज़ियां खानी चाहिए क्योंकि यह शरीर की प्रतीरक्षा प्रणाली के लिए अच्छे होते हैं। इसमें गहरे हरे, पीले और लाल रंग की सब्ज़ियां आती हैं जो कि हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली को साफ करती हैं।

Monday, 17 December 2012

रक्त से स्टेम सेल बनाने की तकनीक खोजी


अब मरीज के गंभीर रोगों का इलाज उसी के खून से संभव हो सकेगा। यह कामयाबी मिलेगी रक्त को स्टेम सेल के रूप में विकसित करने की तकनीक से जिसे कैंब्रिज विश्‌र्र्वविद्यालय में कार्यरत गोरखपुर की बेटी इंबिशात गेती ने खोज निकाला है। रक्त से बनी कोशिकाओं का प्रयोग कर हृदय, दिमाग, आख, अस्थि आदि अंगों की बीमारियों का इलाज हो सकेगा।

गेती का शोध दुनिया के जाने-माने जर्नल स्टेम सेल्स ट्रास्लेशनल मेडिसिन में प्रकाशित हुआ है। शोध में रक्त से बनी स्टेम सेल्स का प्रयोग रक्त वाहिनिया बनाने में किया गया है। चिकित्सा विज्ञान में इसे बड़ी उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है। इंबिशात के मुताबिक इन स्टेम सेल्स की खासियत यह है कि वे अपने को शरीर के किसी भी अंग की कोशिकाओं के रूप में विकसित कर सकती हैं। इसी विशेषता के कारण ये हृदय, दिमाग, किडनी, नेत्र सहित किसी भी अंग की बीमारियों का इलाज करने में सक्षम हैं। शोध के समय गेती ने इस बात का भी ध्यान रखा है कि ये कोशिकाएं एक ऐसे रिपेयर सेल के रूप में काम करें जो रक्त के जरिये पहुंचकर रक्त वाहिनियों की मरम्मत कर सकें। इस शोध निष्कर्ष के बाद उन्हें स्टेम सेल के तौर पर विकसित किया गया है।

इंबिसात गेती ने बताया कि स्टेम सेल बनाने का सबसे आसान व सुलभ स्त्रोत मरीज का रक्त है। हमने इस तकनीक को आसान, सस्ता व जल्द पूरा होने वाला बनाने की कोशिश की है। इंबिशात ने गोरखपुर विश्‌र्र्वविद्यालय से बीएससी और बैंगलोर से एमएससी किया। इसके बाद कैंब्रिज विश्‌र्र्वविद्यालय ज्वाइन कर शोध कार्य शुरू किया। उनका शोध पत्र हाल ही में प्रकाशित हुआ है। शोध में 11 लोगों ने उनका सहयोग किया है। स्टेम सेल खुद को शरीर के किसी भी अंग की कोशिकाओं के रूप में विकसित कर सकती हैं। नए सेल्स का निर्माण भी कर सकती हैं।

कैसे बेहतर नई तकनीक

-स्टेम सेल्स कई तरह के होते हैं। इपिथियल स्टेम सेल्स त्वचा कोशिकाओं के रूप में विकसित किए जा सकते हैं।

-न्यूरो स्टेम सेल्स न्यूरो संबंधित रोगों के इलाज में कारगर हैं, पर यह दोनों स्टेम सेल्स सिर्फ उसी अंग के इलाज में कारगर हैं जहा से निकाले गए हैं।

-बड़ी उम्र के लोगों के अंगों से स्टेम सेल्स तैयार करने में दिक्कत है कि उन्हें अलग करना आसान नहीं होता, क्योंकि वे सीमित मात्रा में होते हैं।

-भ्रूण से बने स्टेम सेल्स हर तरह की कोशिकाएं बना सकते हैं लेकिन इससे इलाज में कई दिक्कतें भी हैं।

-भ्रूण हत्या से जुड़ी होने के कारण यह तकनीक विवादित है। साथ ही ऐसी कोशिकाओं को शरीर आसानी से स्वीकार नहीं कर पाता, जैसी दिक्कत अंग प्रत्यारोपण में आती है।

-स्टेम सेल का एक दूसरा जरिया मानव त्वचा है। इसे भी शरीर स्वीकार कर सकता है, पर त्वचा या अन्य अंगों से निकाली कोशिकाओं के लिए बायोप्सी करनी पड़ती हैं।

-ये सभी तरीके कठिन होने के साथ ही खर्चीले व अधिक समय लेने वाले हैं। रक्त से तैयार स्टेम सेल्स निकालने का तरीका आसान, कम खर्चीला व कारगर है। 

Thursday, 13 December 2012

बच्चों को भी हो सकता है अस्‍थमा


बच्चों में अस्‍थमा का मुख्‍य कारण दूषित वातावरण है। इसके साथ ही कुछ मांएं अपने बच्‍चों को स्‍तनपान नहीं करवाती हैं, जिसका असर बच्‍चे की रोग प्रतिरोधक क्षमता और उसकी सेहत पर पड़ता है। जिससे वे अस्थमा सहित कई दूसरी बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं।

अस्थमा श्वास संबंधी रोग है। इसमें श्वास नलिकाओं में सूजन आने से वे सिकुड़ जाती हैं, जिससे सांस लेने में तकलीफ होती है। अस्थमा का अटैक आने पर श्वास नलिकाएं पूरी तरह बंद हो सकती हैं, जिससे शरीर के महत्वपूर्ण अंगों को ऑक्सीजन की आपूर्ति बंद हो सकती है।

अस्थमा के कारण 

एलर्जी- एलर्जी और अस्थमा का गहरा संबंध होता है। कुछ बच्‍चे पर्दे, गलीचे, कार्पेट, धुएं, रूई के बारीक रेशे, ऊनी कपड़े, फूलों के पराग, जानवरों के बाल, फफूंद और कॉकरोच जैसे कीड़े के प्रति एलर्जिक होते हैं।

मोटापा- मोटापा भी अस्थमा का एक बड़ा कारण है। बच्‍चों का अधिक वजन फेफड़ों पर अधिक दबाव डालता है जिससे अस्थमा की आशंका बढ़ जाती है।

वायु प्रदूषण- प्रदूषण की वजह से अस्थमा की समस्या लगातार बढ़ रही है।

स्मोकिंग- सिगरेट के धुएं से भरे माहौल में रहने वाले शिशुओं को अस्थमा होने का खतरा होता है। यदि प्रेग्‍नेंसी के दौरान कोई स्‍त्री सिगरेट के धुएं के बीच रहती है, तो उसके बच्चे को अस्थमा होने का खतरा होता है।

मौसम का बदलाव- तापमान में बदलाव से एलर्जी के मामले बढ़ते हैं। ज्यादा गर्म और नम वातावरण में अस्‍‍थमा के फैलने की सम्भावना अधिक होती है। ठंडी हवा से भी अस्थमा का दौरा पड़ सकता है।

आनुवांशिक- आमतौर पर अस्थमा पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता है। जब माता-पिता दोनों को अस्थमा होता है, तो उनके बच्चों को भी अस्थमा होने की संभावना अधिक रहती है।


अस्थमा के लक्षण
दिल की धड़कन का बढऩा
अक्सर सर्दी-जुकाम या खांसी का होना
रात में और सुबह कफ की शिकायत होना    
सांस लेने में परेशानी, बेचैनी
खेलने और एक्सरसाइज के दौरान जल्दी थकना व सांस फूलना   
सीने में जकडऩ व दर्द की शिकायत
सांस लेने पर घरघराहट जैसी आवाज आना

अपनाएं ये परहेज

अस्थमा होने पर बच्‍चों को कुछ बातों का खास ध्यान रखना चाहिए ताकि वे सामान्य जिंदगी व्यतीत कर सकें।

एलर्जी के कारणों से रहें दूर- जिन चीजों से एलर्जी हो उनसे दूर रहें, जैसे कुछ बच्‍चो को पुरानी किताबों की गंध, परफ्यूम, अगरबत्ती, धूप, कॉकरोच, पालतू जानवरों आदि से एलर्जी होती है। 

उचित खान-पान- अस्थमा की वजह गलत खानपान भी है। तला हुआ खाना अस्थमा को बढ़ाता है। जंक फूड न खाएं इससे एलर्जिक अस्थमा का खतरा बढ़ जाता है। गाजर, शिमला मिर्च, पालक और दूसरे गहरे रंग के फलों और सब्जियों को डाइट में शामिल करें, क्योंकि इनमें बीटा कैरोटीन होता है।

मौसम में परेशानी - अगर आपके बच्‍चे को मौसमी परेशानी हो तो उसे मौसम के शुरू होने से पहले डॉक्टर की सलाह से प्रिवैंटिव इनहेलर दे सकते हैं।

लेट नाइट खाना न खिलाए - रात को देर से खाना खाकर सो जाने से अस्थमैटिक बच्‍चों के लिए नुक्सान होता है। इसलिए बच्‍चों को सोने से कम से कम 2 घंटे पहले डिनर करवा दें।



Tuesday, 11 December 2012

कैंसर की शुरूआती अवस्था


कैंसर को बहुत ही खतरनाक रोग माना जाता है, क्योंकि ज्यादातर मामलों में यह मरीज की जान ले लेता है। ऐसा इसलिए भी होता है क्योंकि इसका पता बहुत देर से लगता है। इसलिए अगर इस रोग की शुरूआती अवस्था में हीं इसका इलाज शुरू कर दिया जाये तो मरीज की जान बचाई जा सकती है। आज के ज़माने में मेडिकल साइंस ने इतनी तरक्की कर ली है कि अब बहुत से कैंसर के मरीजो की जान बचा ली जाती है। इसलिए इस जानलेवा रोग से अब घबराने कि जरूरत नहीं है लेकिन इसकी शुरूआती अवस्था के बारे में जागरूक होने की आवश्यकता जरूर है। 

आम तौर पर साधारण इंसान सिर्फ स्तन कैंसर, फेफड़ों का कैंसर, ब्रेन कैंसर, हड्डियों का कैंसर, ब्लड कैंसर इत्यादि के बारे में जानता है। जबकि कैंसर सौ से भी ज्यादा प्रकार के हो सकते हैं। इसलिए विभिन्न प्रकार के कैंसर की शुरूआती अवस्था एक दूसरे से भिन्न होती है।

कैंसर का प्रथम चरण यानि प्राम्भिक अस्वस्था

कैंसर के प्रथम चरण को प्रारंभिक अवस्था भी कहा जाता है। प्रथम चरण को उप चरण जैसे 1 ए  और 1 बी में भी बांटा  जा सकता है। 1 ए की अवस्था में आम तौर पर घातक  ऊतक आकार में 2 से 3 सेमी से अधिक नहीं होते हैं और अपने मूल अंग के भीतर ही भीतर निहित रहते है।

लेकिन जैसे जैसे यह रोग बढ़ता है यानि 1 बी की अवस्था में पहुँचता है तो कैंसर कोशिकाओं के आकार में बृद्धि होने लगती है जो इस अवस्था में भी मूल अंग के साथ हीं निहित रहता है लेकिन कुछ मामलों में इसका मेटास्टेसिस होना यानी दूसरे अंगों तक फैलना या दूसरे  अंगों तक पहुंचना भी संभव होता है। यदि मेटास्टेसिस होता है, तो इसका मतलब है कि कैंसर दूसरे अंगों तक फैल रहा है।

ऐसी अवस्था में सर्जरी शायद एक उपयुक्त उपचार माना जाता है। इस प्रकार की सर्जरी में पीड़ित अंग के खास हिस्से को रिसेक्स्न नामक प्रक्रिया के माध्यम से निकाल दिया जाता है।  लेकिन आप बाहरी बीम विकिरण चिकित्सा या कीमोथेरपी की सहायता से भी कैंसर की वृद्धि को रोक सकते हैं अथवा कैंसर कोशिकाओं को ख़त्म कर सकते हैं।

अगर उपरोक्त सारे उपचार अप्रभावी साबित हों तो आप एक नैदानिक परीक्षण का सहारा ले सकते हैं जिसमें  शल्य चिकित्सा, विकिरण या रसायन चिकित्सा के विभिन्न संयोजन शामिल होते हैं यानि एक साथ  कई उपाय अपनाये जा सकते हैं।   

कैंसर का दूसरा चरण

जब हम कैंसर की माध्यमिक स्तर की चर्चा करते हैं तब इसका मतलब  होता है कि हम आम तौर पर कैंसर के दूसरे चरण की चर्चा कर रहे हैं। यह चरण भी  सामान्यतः 2 ए और 2 बी के उप - चरणों में बंटा हुआ रहता है।  स्टेज 2 ए में, घातक ऊतक आकार में 2 से 3 सेमी होते हैं और इसके असामान्य कोशिकाएं पड़ोसी लिम्फ नोड्स यानि अपने आसपास के अंगों में मेटासिस हुए रहते हैं। जब कैंसर आगे 2 बी  चरण की ओर प्रगति करने लगता है तो इस अवस्था में भी लिम्फ नोड्स प्रभावित हुए रहते हैं लेकिन आप पाएंगे कि कैंसर का मेटासिस भी होने लगा है यानि कैंसर कोशिकाएं दूसरे अंगो तक भी पहुँचने लगे हैं।

इस चरण में भी कैंसर के पहले चरण वाली चिकित्सा हीं उपयोग में लाई जाती है मसलन सर्जरी के जरिये हानिकारक उत्तकों को निकालना या बाहरी विकिरण की चिकित्सा प्रदान करना ताकि कैंसर के गांठ को कम किया जाये या बढ़ने से रोका जा सके या उसके कुछ भाग को नष्ट किया जा सके या केमोथेरपी के जरिये कैंसरस कोशिकाओं को फैलने से रोका जा सके। आम तौर पर  पहले सर्जरी की जाती है उसके बाद केमोथेरपी या विकिरण चिकित्सा दी जाती है।

कैंसर का ज्ञात कैसे किया जाता है

बायोप्सी के द्वारा भी कैंसर का ज्ञात किया जाता है। इसमें कैंसर के एक छोटे  भाग को निकालकर उसका परीक्षण किया जाता है। गाँठ छोटी होने पर पूरी गाँठ हीं निकाल  ली जाती है लेकिन गाँठ बड़ी होने पर उसका थोडा भाग हीं निकाला जाता है ताकि परिक्षण किया जा सके। मेमोग्राम के जरिये भी आप कैंसर का पता लगा सकते हैं। एम् आर आई भी ब्रेन ट्यूमर का पता लगाने में काफी कारगर सिद्ध होता है। 
कैंसर से घबराएं नहीं; कैंसर के लक्षण को पहचाने तथा सही समय पर सही उपचार लें।



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Commercial Gas : In the liquefied petroleum gas (LPG) trade, 'industrial installations' generally refer to the installation at factories and the 'commercial installations' relate to the larger type of catering establishments, such as hotel, restaurants and canteens.
Industrial Gas : In the liquefied petroleum gas (LPG) trade, 'industrial installations' generally refer to the installation at factories and the 'commercial installations' relate to the larger type of catering establishments, such as hotel, restaurants and canteens.
Burners Fitting : Gas operated Infra Red Radiant Burners (can be adapted to radiant heat if required). Industrial uses include Brooding, Curing, Drying, Food Processing, almost all purposes where Metal Fabricating and Finishing, Textile Drying and Weld Pre-heating. Also available in longer length. This item is also available in as per customer requirement .
LPG Plants : Bulk LPG Installation can be Designed,  Supplied, Installed & Commissioned on  turnkey Basis In Accordance to Explosive Norms/Local Statutory Requirements.
Gas Cylinders : LOT  Manifold is installed where peak load of Equipments is higher & everage consumption of LPG is up no much ie its up to 2 tone per day.  We called this is a small bullet. It can install instead of bulk where there is space no space for bulk installation. This system is completely safe to handle. We follow Is-6044 Part-1 & 2 & OISD norms for these types of installations.

Sunday, 9 December 2012

'मॉड्यूनॉल' का रोगों पर प्रहार


मॉड्यूनॉल नामक तत्व ने आधुनिक मेडिकल साइंस में सभावनाओं के कई द्वार खोल दिए हैं। दुनिया भर के अनेक मशहूर डॉक्टरों और अध्ययनकर्ताओं ने इस तत्व को अनेक रोगों के इलाज में कारगर माना है। क्या है यह तत्व और इसकी खूबिया क्या हैं..?

अब विकसित देशों में अर्थराइटिस और दिल के रोगी बढ़ने लगे, तब वैज्ञानिकों ने इन बीमारियों का समुचित इलाज तलाशने के लिये दुनिया भर में प्रयास किये। इन्हींप्रयासों के दौरान उन्होंने कई सर्वेक्षणों के बाद यह निष्कर्ष निकाला था कि न्यूजीलैंड के एक समुद्री तट पर रहने वाले मायोरी प्रजाति के आदिवासी लोग 80 वर्ष की उम्र होने के बाद भी स्वस्थ हैं। वे न तो जोड़ों में दर्द की समस्या से ग्रस्त है और न ही दिल और फेफड़े से सबधित तकलीफों से।

'मसेल' बना वरदान

ऐसे में वैज्ञानिकों ने मायोरी प्रजाति के इन लोगों के खान-पान के सदर्भ में विश्लेषण किया। इस विश्लेषण से पता चला कि उनका मुख्य आहार समुद्री तटों पर पाया जाने वाला एक समुद्री जीव है। इस जीव को ग्रीन लिप्ड मसेल कहते है। बहरहाल, वैज्ञानिकों ने मसेल को विभिन्न रोगों के इलाज में कारगर बनाने के लिये काफी प्रयोग किये। अंतत: जब मसेल के निचोड़ को एक पेटेन्टेड पद्घति द्वारा परिष्कृत किया गया, तब एक असाधारण तत्व मॉड्यूनॉल का निर्माण हुआ, जो अब कई रोगों के इलाज में वरदान साबित हो रहा है। आइए जानते हैं कि देश में पिछले दो सालों से उपलब्ध मॉड्यूनॉल नामक तत्व ने किस तरह अपनी उपयोगिता साबित की है

उदाहरण के तौर पर मुंबई निवासी हर्ष चौहान और वैभव चौहान उम्र में क्रमश: 8 और 6 वर्ष के है, लेकिन डयूशेन मस्कुलर डिस्ट्रॉफी नामक रोग ने इन भाइयों को अपने स्वास्थ्य के प्रति काफी सजग कर दिया है। जैसे ही इन बच्चों में लड़खड़ाहट और सीढ़ी चढ़ने में तकलीफ की शुरुआत हुई,तो उन्हें स्टेरॉयड-कार्टीसोन देने के बजाय मॉड्यूनॉल का सेवन करने की सलाह दी गयी। यह तत्व बच्चों की मासपेशियों के क्षय को रोकने के अलावा उन्हें ऊर्जा भी प्रदान कर रहा है। ऐसी ऊर्जा जो एक चचल बालक के लिए बहुत आवश्यक है। नतीजा सामने है कि इस गभीर जेनेटिक रोग के कारण प्रतिवर्ष होने वाली 10 से 15 प्रतिशत की मासपेशियों की कमजोरी आज भी उनसे दूर है।

वैज्ञानिक कसौटी पर

उतरा खरा

वास्तव में मॉड्यूनॉल अपने चमत्कारिक प्रभाव की वजह से मासपेशियों और जोड़ों में ही नहीं, बल्कि नसोंके पुनर्निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। शायद इसीलिए स्पाइनल कॉर्ड इंजरी से ग्रस्त बरेली निवासी प्रशान्त शुक्ला स्टेम सेल का इलाज आगे न ले सकने के बावजूद दिनोंदिन बेहतर होते जा रहे है और उनके पैरों की ताकत तेजी से वापस आ रही है।

इसी तरह अर्थराइटिस के इलाज में यह तत्व लखनऊ निवासी चमन लाल यादव के लिए भी वरदान साबित हुआ। यादव अपने बाएं कूल्हे के जाम होने और दर्द से पिछले 15 वर्षो से परेशान थे।

दुनिया के चार महाद्घीपों में उपलब्ध इस तत्व ने अपनी उपयोगिता हर मापदंड पर साबित की है। मॉड्यूनॉल पर शोध कार्य करने वाली ब्रिटेन के ग्लासगो हॉस्पिटल में कार्यरत डा. शीला गिब्सन के अनुसार यह तत्व रूमैटॉइड और ऑस्टियोअर्थराइटिस के इलाज में काफी लाभप्रद साबित हुआ है। महत्वपूर्ण बात यह कि इस तत्व के दुष्परिणाम भी नही है। यही नहीं, यह तत्व बच्चों से लेकर वृद्धों तक में सुरक्षित और कारगर रूप से कार्य करता है।

क्वीन्सलैंड विश्वविद्यालय के डॉ. डागरैल के अनुसार यह तत्व सूजन को कम करने के अलावा शरीर की प्रतिरक्षण शक्ति को नियत्रित करने का भी कार्य भी करता है। इसलिए यह ऑटो इम्यून रोगों जैसे अल्सरेटिव कोलाइटिस और क्रोन्स डिजीज, रूमैटॉइड अर्थराइटिस ओर एन्कायलोसिग स्पोंडिलाइटिस आदि में भी काफी उपयोगी है।

इन रोगों में कारगर

- रूमैटॉयड अर्थराइटिस व ऑस्टियो अर्थराइटिस में।

-हृदय व सास से सबधित बीमारिया।

-मस्कुलर-डिस्ट्रॉफी नामक रोग।

-अत्यधिक शारीरिक क्षमता वाले खेलों जैसे साइक्लिग,फुटबाल और क्रिकेट आदि में शारीरिक क्षमता बढ़ाने के लिए।


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Friday, 7 December 2012

कम वसामुक्त भोजन रखेगा आपको पतला


अगर आप अपने मोटापा को घटाने के लिए रात दिन मशक्कत करते है। इसके बावजूद मनमाफिक परिणाम नहीं मिल रहे हैं तो यह खबर आपके लिए है। अपने खानपान में वसायुक्त खाद्य पदार्थो की जगह कम वसायुक्त

चीजों को शामिल करें इससे दुबला होने में मदद मिलेगी। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) समर्थित एक शोध में यह बात कही गई है।

अमेरिका, यूरोप व न्यूजीलैंड में 73,589 लोगों पर किए गए 33 परीक्षण में पता चला है कि कम वसायुक्त भोजन खाने से लोगों को 3.5 पाउंड वजन कम करने में मदद मिलती है। शोधकर्ताओं ने कहा कि शोध के परिणाम पहली बार साबित करते हैं कि बिना अधिक मशक्कत के भी लोग अपना वजन कम कर सकते हैं। प्रमुख शोधकर्ता यूर्निवसिटी ऑफ ईस्ट एंजेलिया मेडिकल स्कूल की ली हूपर ने कहा कि जब लोग कम वसा वाला भोजन खाते हैं तो उनकावजन घटता है।

शोध के दौरान उन लोगों पर ध्यान केंद्रित किया गया जो अपने खानपान में वसा की कटौती कर रहे थे, लेकिन उनका लक्ष्य वजन को कम करना नहीं था। इसलिए वे सामान्य भोजन खा रहे थे। हूपर ने कहा कि आश्चर्यजनक बात यह थी कि उनका वजन कम हुआ और उनकी कमर पतली हुई। शोधकर्ताओं ने बताया कि डब्ल्यूएचओ के न्यूट्रीशन गाइडेंस एक्सपर्ट एडवाइजरी ग्रुप से वसा के सेवन पर दिशा-निर्देशों को अपडेट करने के आग्रह के बाद

उसने शोध की समीक्षा की। अब डब्ल्यूएचओ वैश्रि्वक स्तर पर इसकी सिफारिश करेगा। मोटापे के कारण कई बीमारियों जैसे कैंसर, स्ट्रोक और दिल संबंधी अन्य बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। इसके कारण दुनियाभर में हर साल करीब 17 लाख लोगों की मौत हो जाती है।



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Monday, 26 November 2012

तनाव से कैसे बचें ( Self-help Tips for Depression and Anxiety )

तनाव यानि स्ट्रेस से कई बीमारियाँ होती हैं।  तनाव से मधुमेह रोगियों की स्थिति बिगड़ती है क्योंकि तनाव शुगर लेवल को बढाता है; तनाव से ब्लड प्रेशर बढ़ता है, स्ट्रेस एटेक आता है; सर दर्द होता है एवं अन्य कई गंभीर बीमारियाँ होती हैं। तनावग्रस्त व्यक्ति का मन भी किसी काम को करने में पूरी तरह नहीं लगता एवं वह अपनी क्षमता के अनुसार किसी कार्य को पूरा नहीं कर पाता। अतः तनाव से बचना चाहिए। यहाँ हम तनाव से बचने के कुछ उपाय बता रहे हैं।

अपनी सोच बदलें: कुछ चीजें इंसान के हाथ में नहीं होती मसलन भूकंप  आना, बाढ़  आना, कैंसर जैसे किसी गंभीर बीमारी का शिकार होना इत्यादि। अतः इन बातों के बारे में सोचकर तनावग्रस्त न रहा करें। तनाव में आने से हालात में कोई फर्क नहीं आता लेकिन इंसान की स्थिति और बिगड़ती है। इसलिए जो आपके हाथ में नहीं उनपर ज्यादा न सोचा करें।

जरुरी कार्य को टाले नहीं: जो काम जिस समय पर  ख़त्म  कर लेना है उस  काम को समय के पहले हीं निपटाने का प्रयास करें। टेलीफोन बिल भरने की, बिजली बिल भरने की, प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार करने की अंतिम तारीख के पहले हीं इन कामों को निपटा लें वरना ज्यों ज्यों अंतिम तारीख निकट आती जाएगी आप तनावग्रस्त होते जायेंगे। और कहीं जो अंतिम तारीख भी आ गई तो हर वक़्त आपको इस बात का स्ट्रेस रहेगा कि पता नहीं वक्क्त रहते काम होगा या नहीं।

अपनी क्षमता से ज्यादा काम न लें: कुछ लोगों को जितना भी काम मिलता जाता है, लालच में लेते जाते हैं। ज्यादा मेहनत करना अच्छी बात है लेकिन अपने हाथ में काम उतना हीं लें जितना आप बिना किसी तनाव में आये समय पर पूरा कर सकें। अपनी क्षमता से ज्यादा ऑर्डर या काम लेने से आप काम करते वक्त तनाव में रहेंगे जिससे आपके साथ साथ आपके घरवाले भी तनाव में रहेंगे जिसका बुरा प्रभाव सब पर पड़ेगा और आपके काम कि क्वालिटी भी ख़राब होगी जिसके चलते आपको अलग से तनाव झेलना होगा।


सिर्फ काम न करें; अपना मन भी बहलायें: आज के ज़माने में घर की जरूरतें पूरी करने के लिए कई लोगों को ज्यादा से ज्यादा काम करने की जरुरत होती है। लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि आप हर वक़्त सिर्फ काम हीं करते रहें। सिर्फ काम करते रहने से आपकी स्फूर्ति कम होती जाएगी और आपपर तनाव हावी होता जायेगा। इसलिए आप चाहे जितना भी काम करें, कुछ समय के लिए मन बहलाने वाली चीजों में भी मन लगायें। इससे आप तनाव से बचे रहेंगे साथ हीं साथ आपकी कार्य क्षमता भी बढ़ेगी। म्यूजिक सुनें, फ़िल्म देखें, कोई खेल खेलें, दोस्तों या परिवार के साथ या अपने किसी खास दोस्त के साथ गप्पे लड़ाएं या कही घूमने जायें या किसी अन्य गतिविधि में लिप्त हों जिसमें आपका मन लगता हो। 

गाना गुनगुनाएं या नृत्य करें: गाना सुनने से तो तनाव कम होता है, गाना गुनगुनाने से भी तनाव बहुत कम होता है। इसके लिए कोई जरुरी नहीं कि  आपका गला बहुत अच्छा हीं हो। आपकी आवाज सुरीली हो या न हो, अपना पसंदीदा गाना अवश्य गुनगुनाएं। अगर आप अपनी पसंद की म्यूजिक  पर  थोडा बहुत डांस कर सकें तो सोने पे सुहागा। ऐसा करने से आपका तनाव बहुत कम होगा।

व्यायाम, योग या मेडीटेशन करें : नियमित रूप योग, व्यायाम या मेडीटेशन करते रहने से आप तनाव से बचे रहेंगे। 

पर्याप्त नींद लें : स्ट्रेस से बचना है तो आपको पर्याप्त नींद लेनी होगी। अपर्याप्त नींद तनाव के साथ साथ ब्लड शुगर, ब्लड प्रेशर बढाती है एवं कई रोगों को भी जन्म देती है  ।

पानी पीयें: पानी पीने से तनाव बहुत कम होता है अतः जब भी आप तनाव में हों, पानी पीयें। भरपूर पानी पीते रहने से तनाव आपसे दूर हीं रहता है। 

हमेशा दूसरों से मुकाबला न किया करें: कुछ लोगों को हर काम में दूसरों की बराबरी करने की आदत होती है। हर किसी की कार्य करने की क्षमता अलग अलग होती है। अतः आप अपनी क्षमता के अनुसार हीं काम किया करें। दूसरों से मुकाबला करने से बेवजह आपका तनाव बढेगा। मुकाबला वहां करें जहाँ मुकाबला  करने की जरुरत हो; हर समय नहीं।



Self-help Tips for Depression and Anxiety


Many health experts agree that self-help n is the best approach to deal with depression t. However, self-help in such turbulent times may not be the best because the affected person might not be able to think rationally. But, if you’re willing to tone down your worries and get over anxiety, you should know a few thing. So, take a look at the points below and work towards getting yourself out of the depressed state of mind.

Understanding of depression: You must always start with learning and understanding depression. Self-help for depression or anxiety becomes more effective once you know what you are up against. Figure out how the events in your life are making you feel, act and think different. Once you’ve pinned down the reasons you will have to work on how to be less affected by those.

Challenge your thinking to get over problems: When you are seeking a solution to your problems, you must believe that you will be able to overcome the hurdles. If you look at things in a depressive/submissive way, nothing will be of any help to you. You must always try to be an optimist. It is better if you write down the original thought along with all things you can do to help it.

Activities to occupy your mind: Engage in activities, which will prevent you from thinking about your problems. No, we’re not saying that you become an escapist and run away rather than deal with the problem in hand. If you don’t have anything to do all day long, you are bound to think the worst you can. This would make you even more depressed and do more damage than good to your mental health.

Get necessary relaxation during the day: Relaxation helps release tension in order to get you back to a more relaxed state of mind. You have several options to choose from several mind-calming techniques such as meditation, self hypnosis and tai chi.

Duration to solve your problem: If you believe that you are facing a big problem or several problems that can’t be sorted in a day or a week, decide the duration to resolve it. If you strongly believe that you will not be able to do it by yourself, it is advisable to speak to an expert; do not dwell upon it unnecessarily.

Exercise for depression: There is no specific exercise to get rid of depression or anxiety, but involve yourself in as many physical activities as possible; it is for you to decide the kinds you want to engage in. It can be anything from moderate brisk walk to high intensity muscle building or even sports.

Maintaining a healthy lifestyle: To ascertain that your health won’t deteriorate, it is important to eat at the right times (3 meals a day), irrespective of whether you are hungry or not. Moreover, regulate your sleep patterns and do the things that you do usually.

Hope these tips come in handy and you’re able to overcome the depressive state of mind you were dwelling on.


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Wednesday, 19 September 2012

ऑपरेशन से पैदा हुए बच्चे हो सकते हैं मोटे

अमरीकी शोधकर्ताओं का कहना है कि कुदरती तरीके के बजाए ऑपरेशन के जरिए जन्म लेने वाले शिशुओं में जरूरत से ज्यादा मोटा होने का खतरा दो गुना ज्यादा होता है. मेसाचुसेट्स स्थित बोस्टन चिल्ड्रन हॉस्पिटल के शोधकर्ताओं ने अपने शोध में पाया कि तीन साल की उम्र तक आते-आते इन बच्चों पर चर्बी चढ़ना शुरु हो जाता है.



शोध दल का कहना है कि हो सकता है कि चीरफाड़ की वजह से उस बैक्टीरिया पर असर पड़ता हो जिसका संबंध भोजन के पाचन से होता है.
शोधकर्ताओं ने वर्ष 1999 से वर्ष 2002 के दौरान 1255 मां-बच्चों का अध्ययन किया. इन माताओं पर शोध तभी शुरू कर दिया गया था जब उनका गर्भ 22 हफ्तों का भी नहीं था. जन्म के फौरन बाद शिशु का वजन किया गया. शिशु जब तीन वर्ष का हो गया, उसका वजन दोबारा किया गया.

जन्म का तरीका
शोधकर्ताओं ने पाया कि प्रत्येक चार में से एक बच्चे का जन्म ऑपरेशन के जरिये हुआ. बच्चे का जन्म कुदरती तरीके से हुआ या ऑपरेशन से, इसक सीधा संबंध बच्चे के वजन और उसकी त्वचा के मोटेपन से पाया गया. शोधकर्ताओं ने ये भी पाया कि ऑपरेशन के जरिये बच्चों को जन्म देने वाली महिलाओं का वजन अपेक्षाकृत ज्यादा तेजी से बढ़ता है.

शोधकर्ताओं का कहना है कि गर्भवती महिलाओं को इस बारे में बताया जाना चाहिए कि ऑपरेशन के जरिए बच्चे को जन्म देने पर बच्चे के मोटे होने का खतरा ज्यादा होता है.

ब्रिटेन में पैदा होने वाले बच्चों में से 23 प्रतिशत से भी ज्यादा शिशुओं का जन्म ऑपरेशन के जरिए होता है. रॉयल कॉलेज के प्रवक्ता पैट्रिक ओब्रियन का कहना है, ''ये एक रोचक अध्ययन है, लेकिन इसमें जितने मामलों की पड़ताल की गई, उनकी संख्या कम है. इस अध्ययन को अपेक्षाकृत ज्यादा लोगों पर आजमाने की जरूरत है.''


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Sunday, 16 September 2012

हल्दी बचा सकती है दिल के दौरे से

खाने को ज़ायकेदार रंग देने और खूबसूरती को निखारने के लिए इस्तेमाल होने वाली हल्दी अब आपके दिल की भी हिफाजत कर सकती है |

एक अध्ययन से संकेत मिले हैं कि बायपास सर्जरी कराने वाले हृदय रोगियों के लिए हल्दी बहुत फायदेमंद साबित हो सकती है और दिल के दौरे से बचा सकती है |

बायपास सर्जरी के दौरान रक्त प्रवाह की कमी के चलते हृदय की मांसपेशियों को नुकसान हो सकता है, जिससे मरीज को दिल का दौरा पड़ने की आशंका बढ़ जाती है.

हल्दी में कई ऐसे तत्व पाए जाते हैं जो इन खतरों का मुकाबला करने में मददगार साबित होते हैं. समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार अमरीका के ह्यूस्टन में स्थित एंडरसन कैंसर रिसर्च सेंटर के भरत अग्रवाल ने इसे बहुत ही उत्साहजनक शोध बताया है.

'दौरे का खतरा 65 फीसदी कम'
यह शोध थाईलैंड के चियांग माई विश्वविद्यालय में हुआ जिसमें 2009 से 2011 के बीच बाइपास सर्जरी कराने वाले 121 लोगों ने हिस्सा लिया.

इनमें से आधे लोगों को दिन में चार बार एक ग्राम हल्दी के तत्व से बने कैप्सूल दिए गए जबकि बाकी लोगों को दूसरे कैप्सूल दिए गए. ये कैप्सूल सर्जरी होने से तीन दिन पहले और सर्जरी होने के पांच दिन बाद तक दिए गए. 'अमेरिकन जनरल ऑफ कार्डियोलॉजी' में छपे इस शोध के नतीजों के मुताबिक ऑपरेशन के बाद अस्पताल में रहने के दौरान हल्दी का कैप्सूल लेने वालों में दिल का दौरा पड़ने की आशंका 13 प्रतिशत थी जबकि दूसरे कैप्सूल लेने वालों में यह आशंका 30 प्रतिशत के आसपास पाई गई.

यह शोध करने वाले टीम के प्रमुख डॉक्टर वारवारंग वांगचेरोन का कहना है कि हल्दी से बने कैप्सूल लेने वालों में दिल के दौरे का खतरा 65 फीसदी कम पाया गया. हालांकि यह शोध हृदय रोगियों के छोटे से समूह पर किया गया और जानकारों का मानना है कि अभी और व्यापक शोध करने होंगे


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Friday, 14 September 2012

चेहरा सुन्दर बनायें

चेहरे को सुन्दर बनाने के लिए हम क्या कुछ नहीं करते, बाज़ार नए-२ प्रोडक्ट से भरा पड़ा है .क्या लगायें , क्या छोड़े, हर प्रोडक्ट के बड़े-२ वादे. लेकिन केमिकल से बने इन प्रोडक्ट्स से समय पूर्व ही चेहरा बड़ी उम्र का नज़र आने लगता है.फिर उसे ढकने के लिए, फिर कोई नया प्रोडक्ट. या फिर पार्लर का सहारा, दुनिया भर का खर्चा, समय की बरबादी के साथ सेहत की बरबादी सो अलग. इतना करने पर मन का मायूश होना फ्री में मिलता है.



तो क्या करे ???????
एक नुस्का, एक- दो सप्ताह भर आजमायें और फर्क देखें. अलोएवेरा की ताज़ा पत्ती थोड़ी सी तोड़ लें .उसमें से निकालने वाला रस चेहरे पर लगाना शुरू कर दें . १०-१५- मिनट बाद सूख जाने पर पानी से धो लिया करें .फर्क देखें और प्रकृति को धन्यवाद देते नहीं थकेंगे|




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Thursday, 13 September 2012

वायरल बुखार में खूब खाएं (Viral fever)


मौसम में बदलाव के साथ ही शरीर में भी कई प्रकार के बदलाव शुरू हो जाते हैं और गर्मी में मौसम शरीर नमीयुक्त और चिपचिपा होने लगता है। इस मौसम में वायरल बुखार से ज्यादा लोग प्रभावित होते हैं वायरल से होने वाला बुखार, गला दर्द व नाक बहने की समस्याएं ज्यादा लेकर आता है। यह बुखार बच्चों व बड़ों को समान रूप से प्रभावित करता है। वायरल में संक्रमण की स्थिति कुछ दिनों से लेकर कुछ हफ्तों तक रह सकती है। वायरल में कई लोग खाना-पीना छोड़ देते है। लेकिन खाना छोड़ने से बीमारी और बढ़ जाती है। इसलिए जहां तक संभव हो वायरल में खूब खाना खाएं और डिहाइडेशन से बचने के लिए खूब पानी पिएं।


वायरल बुखार में खाने के फायदे
वायरल बुखार तभी होता है जब शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती हैं और रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए खान-पान का उचित ध्यान रखना चाहिए। अगर सेहतमंद और प्रोटीन युक्त खाना खाया जाए तो शरीर में रोग-प्रतिरोधक क्षमता खुद निर्मित हो जाती है। सादा, ताजा खाना ही खाएं क्योंकि हैवी फूड आसानी से पच नहीं सकते हैं। रखे हुए खाने को गर्म करके ही खाएं क्योंकि इससे सभी बैक्टीरिया समाप्त हो जाते हैं। खाने में अदरक, लहसुन, हींग, जीरा, काल मिर्च, हल्दी और धनिए का प्रयाग अवश्य करें क्योंकि इनमें पाए जाने वाले तत्व पाचन शक्ति को बढ़ाते हैं और वायरल के कीटीणुओं से लड़ते हैं। 

वायरल बुखार में क्या-क्या खाएं 
मौसमी संतरा व नींबू खाएं जिसमें विटामिन-सी और वीटा कैंरोटीस होता है जिससे रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। वायरल फीवर होने पर ड्राई फूड खूब खाना चाहिए।  ड्राई  फूड में जिंक भरपूर मात्रा में पाया जाता है। लहसून में कैल्सियम, मैग्नीशियम, फास्फोरस और खनिज तत्व पाए जाते हैं। इससे सर्दी, जुकाम, दर्द, सूजन और त्वचा से संबंधित बीमारियां नहीं होती हैं। लहसुन घी या तेल तलकर चटनी के रूप में प्रयोग किया जा सकता है। खूब पानी पिएं। इससे डिहाइडेशन के अलावा शरीर पर हमला करने वाले माइक्रो आर्गेनिज्म को बाहर निकालने में मदद मिलती है। तुलसी के पत्ते में खांसी, जुकाम, बुखार और सांस संबंधी रोगों से लड़ने की शक्ति होती है। बदलते मौसम में तुलसी के पत्तियों को उबालकर या चाय में डालकर पीने से नाक और गले के इंफेक्शन से बचाव होता है।

वायरल बुखार में हरी और पत्तेदार सब्जियों का अधिक मात्रा में प्रयोग करें। क्योंकि हरी सब्जियों में पानी का मात्रा ज्यादा होती है जिससे डिहाइडेशन नहीं होता है। टमाटर, आलू और संतरा खाएं। इसमें विटामिन ‘सी’ भरपूर मात्रा में पाया जाता है। वायरल में दही खाना बंद न करें क्योंकि दही खाने से बैक्टीरिया से लड़ने में सहायक मिलती है साथ ही यह पाचन क्रिया को सही रखता है। यह पेट खराब , आलसपन और बुखार को दूर रखता है। वायरल में गाजर खाएं, इसमें केरोटीन पाया जाता है जिससे रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है और कीटाणुओं से लड़ने में मदद मिलती है। अधिक मात्रा में केले और सेब का सेवन करें। इन दिनों में ही अधिक मात्रा में पोटेशियम पाई जाती है जो ऐसा इलेक्ट्रोलाइट है जिससे दस्त समाप्त होती है। 

वायरल बुखार में खाना खूब खाएं लेकिन खाने का गलत कंबीनेशन कभी ना लें। मसलन अगर आप दही खा रहे हैं तो हैवी नानवेज या नींबू अथवा कोई खटटी चीज ना खाएं। ठंडे और तरल पेय पदार्थों का सेवन न करें क्योंकि वे शरीर में पानी रोकते हैं और असंतुलन होता है। वायरल होने पर दिमाग पर बिल्कुल जोर न लगाएं क्योंकि ऐसा करने से शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता कम होगी और वायरल ज्यादा दिनों तक रह सकता है।


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