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Saturday, 29 December 2012

एलोवेरा बनेगा किडनी का सुरक्षा कवच


वनस्पतियों में छिपे औषधीय गुणधर्म हजारों साल से जीवन को संजीवनी देते रहे हैं, लेकिन उनके अनुसंधान पर परिणामी काम नहीं हुआ। अंग्रेजी दवाओं की भेंट चढ़ती जिंदगी में फिर से जान फूंकने के लिए चिकित्सा जगत आयुर्वेद की शरण में खड़ा हैं। लाला लाजपत राय मेडिकल कॉलेज के फार्मोकोलोजी विभाग में गिलोय के बाद अब एलोवेरा पर चल रहे एक शोध में इसे किडनी रोगों पर अत्यंत लाभकारी पाया गया है।

चरक संहिता में भी एलोवेरा को औषधीय गुणों से लवरेज बताया गया है, किंतु वैज्ञानिक शोध पर आधारित पुष्टि की कमी रही। फार्मोकोलोजी विभाग की एमडी की छात्रा डॉ. शालिनी वीरानी ने चूहों पर किए गए एक शोध में पाया कि एलोवेरा के सेवन से एक माह में उनकी किडनी पूरी तरह ठीक हो गई।

इसके लिए चूहों को दो ग्रुप में बाटा गया। पहले ग्रुप में स्वस्थ चूहे, जबकि दूसरे में किडनी के रोगी चूहे रखे गए। स्वस्थ चूहों को लगातार एलोवेरा का डोज दिया गया, जिसके बाद उनमें किडनी रोग का संक्त्रमण नहीं लगा। जिन चूहों की किडनी फेल की गई थी, उन्हें एक माह तक एलोवेरा की खुराक ने पूरी तरह ठीक कर दिया। एलोवेरा की खुराक से चूहों के लीवर की क्षमता भी बढ़ी मिली।

महंगी डायलिसिस से मिलेगी निजात

किडनी रोगियों की संख्या बढ़ने से चिकित्सा के समक्ष एक कठिन चुनौती है। एलोपैथिक में किडनी रोगियों को डायलिसिस पर रखा जाता है, जो महंगा होने के साथ-साथ साइड इफेक्ट भी करता है। एलोवेरा से किडनी रोगों में चमत्कारिक सुधार के संकेत से अब विभाग ट्रायल का दूसरा चरण शुरू करेगा। बाद में इसके पेटेंट के लिए आवेदन किया जाएगा। 



Friday, 21 December 2012

समय रहते संभव है उपचार ब्रेन टयूमर


मस्तिष्क हमारे शरीर का वह महत्वपूर्ण और नाजुक हिस्सा है, जिसका संबंध संपूर्ण शरीर से है। अगर मस्तिष्क के किसी भी हिस्से में कोई तकलीफ हो तो उसका प्रभाव शरीर के दूसरे अंगों की गतिविधियों पर भी पड़ता है।  
आज के दौर में महानगरों में रहने वाले ज्यादातर लोग अति व्यस्तता की वजह से मानसिक तनाव और अवसाद के शिकार हो रहे हैं। साथ ही, आजकल ब्रेन टयूमर जैसी गंभीर बीमारियों के मामले भी देखने में आ रहे हैं। अत: सिरदर्द, चक्कर आना, आंखों के आगे अंधेरा छा जाना, जैसी समस्याओं को मामूली समझ कर अनदेखा करने के बजाय गंभीरता से लेना चाहिए। 
         
क्यों होता है ब्रेन ट्यूमर 

ब्रेन टयूमर क्यों होता है? इसकी वजह अभी तक पता नहीं चली है। तमाम खोजों और अध्ययनों के बाद भी यह हैरानी की बात है कि देश-विदेश के चिकित्सक अभी कोई पुख्ता वजह नहीं ढूंढ पाए हैं कि ब्रेन टयूमर क्यों होता है क्योंकि इसके होने की वजह ठोस रूप से सामने नहीं आई है। इसलिए इससे बचाव के उपाय बताने भी कठिन हैं। इस संबंध में दिल्ली स्थित विद्यासागर इंस्टीटयूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंसेज में गामा नाइफ विशेषज्ञ डॉ. महीप सिंह गौड़ कहते हैं, 'सिर में किसी भी तरह की तकलीफ या मस्तिष्क से जुड़ी किसी समस्या का आभास होने पर तुरंत विशेषज्ञ से संपर्क करें। बीमारी सही समय पर पकड़ में आए तभी निदान आसान हो पाता है।'

मस्तिष्क में मुख्यत: दो प्रकार के टयूमर होते हैं- पहला है बिनाइन टयूमर जो धीरे-धीरे बढ़ता है और दूसरा मेलिगेंट टयूमर, जो कैंसर युक्त होता है। पहले तरह के टयूमर कुछ दवाओं से नियंत्रित हो जाते हैं और जो दवाओं से ठीक नहीं हो पाते उन्हें ओपन सर्जरी और गामा नाइफ सर्जरी से ठीक करने की कोशिश की जाती है परंतु कैंसर युक्त टयूमर पूर्णतया ठीक होते हैं। टयूमर दिमाग में किस जगह पर है सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण यही बात है। डॉ. गौड़ का कहना है कि मस्तिष्क मानव शरीर का सबसे संवेदनशील भाग है। टयूमर उसमें कहां है किस नस को छू रहा है। किस हिस्से पर उसका कितना प्रभाव है, यह बात अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसी पर आधारित होकर मरीज का इलाज किया जाता है। सबको एक जैसा उपचार नहीं दिया जाता उपचार रोग की जटिलता पर निर्भर करता है। कभी-कभी कुछ टयूमर ऐसे होते हैं जहां तुरंत सर्जरी (शल्य चिकित्सा) कर बाद में गामा नाइफ सर्जरी भी करनी पड़ती है। 

ब्रेन टयूमर के लक्षण 


  • अभी तक ब्रेन ट्यूमर के कारणों का सही-सही पता नहीं चल पाया है। पर चिकित्सकों के अनुसार नीचे बताए गए लक्षणों में से अगर कोई भी लक्षण आपको दिखाई दे, तो तुरंत किसी न्यूरो सर्जन से संपर्क करें।
  • कभी-कभी मिरगी के दौरे के सामान दौरा पड़ता हो या बेहोशी आती हो। 
  • सिर में असहनीय दर्द होता हो। 
  • हाथ-पैरों में ऐंठन हो। 
  • ज्यादा कमजोरी का एहसास हो। 
  • सुबह के समय सिर में अक्सर दर्द होता हो। 
  • दृष्टि का अचानक कम होना या कलर ब्लांइडनेस। 


अब आसान है निदान 

दिल्ली स्थित विद्यासागर इंस्टीटयूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंसेज में गामा नाइफ विशेषज्ञ डॉ. महीप सिंह गौड़ का मानना कहते हैं, 'इस तरह के मामले ज्यादा सामने आने की मुख्य वजह है कि अब पहले की तुलना में परीक्षण आसान होने लगा है। कैट स्कैन और एमआरआई समय पर कराने से रोग सामने आने लगा है। पहले यह जांच और परीक्षण बड़े-बड़े शहरों और उनमें भी मुख्य अस्पतालों तक सीमित थे। आज उनका क्षेत्र व्यापक हुआ है। पहले तकलीफ होने पर दूर जाने और महंगे उपचार के डर से लोग कतराते थे चिकित्सक भी अपनी साख को बनाए रखने के लिए जल्दी महंगे टेस्ट कराने की सलाह नहीं देते थे। परंतु आज दिमाग से संबंधित किसी भी रोग का अंदेशा भर होने से चिकित्सक तुरंत विस्तृत जांच कराता है। डॉ. गौड़ का मानना है कि यही वजह है कि पहले जो बीमारी अपने विकराल रूप में सामने आती थी, अब वही छोटे रूप में ही सामने आ जाती है। इसीलिए इलाज पहले से ज्यादा आसान हो गया है। 




Friday, 14 December 2012

हृदयाघात के लक्षण (Heart Attack)


हृदय एक महत्वपूर्ण अंग है जो शरीर के विभिन्न हिस्सों में रक्त संचार करता है। हृदय,रक्त-धमनियों से ऑक्सीजन युक्त रक्त प्राप्त करता है, जिन्हें कोरोनरी आर्टरीज कहा जाता है,यदि इन रक्त धमनियों में रुकावट आ जाती है, तो हृदय की मांसपेशियों को रक्त नहीं मिल पाता है वे काम करना बंद कर देती है, इसे हृदयाघात कहते हैं। 

हृदयाघात की गम्भीरता हृदय की मांसपेशियों को नुकसान की मात्रा पर निर्भर करती है। मृत मांसपेशी, पम्पिंग प्रभाव को कमज़ोर कर हृदय के कार्य पर विपरीत प्रभाव डाल सकती है, जिससे कंजेस्टिव हार्ट फेल्यर होता है। यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें पीड़ित व्यक्ति को सांस लेने में कठिनाई महसूस होती है एवं उसके पैरों में पसीना आने लगता है।

हृदयाघात का सबसे सामान्य लक्षण है-छाती में दर्द, जिसमें प्रायः लगता है कि कोई कसकर छाती को दबा रहा है या यहां कुछ भारीपन महसूस होता है, कभी-कभी चुभन या जलन जैसा दर्द भी हो सकता है।

हालांकि यह दर्द कभी भी हो सकता है, बहुत सारे रोगियों को यह सुबह के समय, जगने के कुछ घंटे के भीतर महसूस होता है। छाती का दर्द या तो छाती के बीचोबीच या पसली-पंजर के केंद्र के ठीक नीचे महसूस होता है, औऱ बांह, पेट, गला औऱ निचले जबड़े तक फैल सकता है।

दूसरे लक्षण हैं-कमजोरी, पसीना आना, जी मिचलाना, उल्टी आना, सांस लेने में तकलीफ, चेतना में कमी, धड़कनें तेज होना, सोचने-समझने की क्षमता में कमी आदि हैं। कई बार हृदयाघात के कारण छाती में जलन, जी मिचलाने और उल्टियां आने पर रोगी इसे अपच की समस्या समझ लेते हैं।

Tuesday, 11 December 2012

कैंसर की शुरूआती अवस्था


कैंसर को बहुत ही खतरनाक रोग माना जाता है, क्योंकि ज्यादातर मामलों में यह मरीज की जान ले लेता है। ऐसा इसलिए भी होता है क्योंकि इसका पता बहुत देर से लगता है। इसलिए अगर इस रोग की शुरूआती अवस्था में हीं इसका इलाज शुरू कर दिया जाये तो मरीज की जान बचाई जा सकती है। आज के ज़माने में मेडिकल साइंस ने इतनी तरक्की कर ली है कि अब बहुत से कैंसर के मरीजो की जान बचा ली जाती है। इसलिए इस जानलेवा रोग से अब घबराने कि जरूरत नहीं है लेकिन इसकी शुरूआती अवस्था के बारे में जागरूक होने की आवश्यकता जरूर है। 

आम तौर पर साधारण इंसान सिर्फ स्तन कैंसर, फेफड़ों का कैंसर, ब्रेन कैंसर, हड्डियों का कैंसर, ब्लड कैंसर इत्यादि के बारे में जानता है। जबकि कैंसर सौ से भी ज्यादा प्रकार के हो सकते हैं। इसलिए विभिन्न प्रकार के कैंसर की शुरूआती अवस्था एक दूसरे से भिन्न होती है।

कैंसर का प्रथम चरण यानि प्राम्भिक अस्वस्था

कैंसर के प्रथम चरण को प्रारंभिक अवस्था भी कहा जाता है। प्रथम चरण को उप चरण जैसे 1 ए  और 1 बी में भी बांटा  जा सकता है। 1 ए की अवस्था में आम तौर पर घातक  ऊतक आकार में 2 से 3 सेमी से अधिक नहीं होते हैं और अपने मूल अंग के भीतर ही भीतर निहित रहते है।

लेकिन जैसे जैसे यह रोग बढ़ता है यानि 1 बी की अवस्था में पहुँचता है तो कैंसर कोशिकाओं के आकार में बृद्धि होने लगती है जो इस अवस्था में भी मूल अंग के साथ हीं निहित रहता है लेकिन कुछ मामलों में इसका मेटास्टेसिस होना यानी दूसरे अंगों तक फैलना या दूसरे  अंगों तक पहुंचना भी संभव होता है। यदि मेटास्टेसिस होता है, तो इसका मतलब है कि कैंसर दूसरे अंगों तक फैल रहा है।

ऐसी अवस्था में सर्जरी शायद एक उपयुक्त उपचार माना जाता है। इस प्रकार की सर्जरी में पीड़ित अंग के खास हिस्से को रिसेक्स्न नामक प्रक्रिया के माध्यम से निकाल दिया जाता है।  लेकिन आप बाहरी बीम विकिरण चिकित्सा या कीमोथेरपी की सहायता से भी कैंसर की वृद्धि को रोक सकते हैं अथवा कैंसर कोशिकाओं को ख़त्म कर सकते हैं।

अगर उपरोक्त सारे उपचार अप्रभावी साबित हों तो आप एक नैदानिक परीक्षण का सहारा ले सकते हैं जिसमें  शल्य चिकित्सा, विकिरण या रसायन चिकित्सा के विभिन्न संयोजन शामिल होते हैं यानि एक साथ  कई उपाय अपनाये जा सकते हैं।   

कैंसर का दूसरा चरण

जब हम कैंसर की माध्यमिक स्तर की चर्चा करते हैं तब इसका मतलब  होता है कि हम आम तौर पर कैंसर के दूसरे चरण की चर्चा कर रहे हैं। यह चरण भी  सामान्यतः 2 ए और 2 बी के उप - चरणों में बंटा हुआ रहता है।  स्टेज 2 ए में, घातक ऊतक आकार में 2 से 3 सेमी होते हैं और इसके असामान्य कोशिकाएं पड़ोसी लिम्फ नोड्स यानि अपने आसपास के अंगों में मेटासिस हुए रहते हैं। जब कैंसर आगे 2 बी  चरण की ओर प्रगति करने लगता है तो इस अवस्था में भी लिम्फ नोड्स प्रभावित हुए रहते हैं लेकिन आप पाएंगे कि कैंसर का मेटासिस भी होने लगा है यानि कैंसर कोशिकाएं दूसरे अंगो तक भी पहुँचने लगे हैं।

इस चरण में भी कैंसर के पहले चरण वाली चिकित्सा हीं उपयोग में लाई जाती है मसलन सर्जरी के जरिये हानिकारक उत्तकों को निकालना या बाहरी विकिरण की चिकित्सा प्रदान करना ताकि कैंसर के गांठ को कम किया जाये या बढ़ने से रोका जा सके या उसके कुछ भाग को नष्ट किया जा सके या केमोथेरपी के जरिये कैंसरस कोशिकाओं को फैलने से रोका जा सके। आम तौर पर  पहले सर्जरी की जाती है उसके बाद केमोथेरपी या विकिरण चिकित्सा दी जाती है।

कैंसर का ज्ञात कैसे किया जाता है

बायोप्सी के द्वारा भी कैंसर का ज्ञात किया जाता है। इसमें कैंसर के एक छोटे  भाग को निकालकर उसका परीक्षण किया जाता है। गाँठ छोटी होने पर पूरी गाँठ हीं निकाल  ली जाती है लेकिन गाँठ बड़ी होने पर उसका थोडा भाग हीं निकाला जाता है ताकि परिक्षण किया जा सके। मेमोग्राम के जरिये भी आप कैंसर का पता लगा सकते हैं। एम् आर आई भी ब्रेन ट्यूमर का पता लगाने में काफी कारगर सिद्ध होता है। 
कैंसर से घबराएं नहीं; कैंसर के लक्षण को पहचाने तथा सही समय पर सही उपचार लें।



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Commercial Gas : In the liquefied petroleum gas (LPG) trade, 'industrial installations' generally refer to the installation at factories and the 'commercial installations' relate to the larger type of catering establishments, such as hotel, restaurants and canteens.
Industrial Gas : In the liquefied petroleum gas (LPG) trade, 'industrial installations' generally refer to the installation at factories and the 'commercial installations' relate to the larger type of catering establishments, such as hotel, restaurants and canteens.
Burners Fitting : Gas operated Infra Red Radiant Burners (can be adapted to radiant heat if required). Industrial uses include Brooding, Curing, Drying, Food Processing, almost all purposes where Metal Fabricating and Finishing, Textile Drying and Weld Pre-heating. Also available in longer length. This item is also available in as per customer requirement .
LPG Plants : Bulk LPG Installation can be Designed,  Supplied, Installed & Commissioned on  turnkey Basis In Accordance to Explosive Norms/Local Statutory Requirements.
Gas Cylinders : LOT  Manifold is installed where peak load of Equipments is higher & everage consumption of LPG is up no much ie its up to 2 tone per day.  We called this is a small bullet. It can install instead of bulk where there is space no space for bulk installation. This system is completely safe to handle. We follow Is-6044 Part-1 & 2 & OISD norms for these types of installations.

Monday, 10 December 2012

पेट दर्द के घरेलू उपचार


अच्छे जीवन के लिए जरूरी है अच्छा स्वास्थ्य। इस संबंध में कहावत मशहूर हैं जैसे कि हेल्थ इज वेल्थ, पहला सुख निरोगी काया आदि। अधिकतर बीमारियों की वजह होती है असंयमित खान-पान। गलत खानपान के कारण कभी-कभी पेट में दर्द होने लगता है। यूं तो पेट दुखने के अलग-अलग कई कारण हो सकते हैं, लेकिन आमतौर पर पेट दर्द का एक मुख्य कारण अपच, मल सूखना, गैस बनना यानी वात प्रकोप होना और लगातार कब्ज बना रहना भी है। पेट दर्द को दूर करने के लिए कुछ घरेलू उपाय है, जो दर्द तो दूर करते है, साथ ही साथ पेट की क्त्रियाओं को भी ठीक करते है। आइए जानें इन उपायो के बारें में।

पेट दर्द के लिए घरेलू उपचार

-पेट दर्द मे हींग का प्रयोग लाभकारी होता है। 2 ग्राम हींग थोड़े पानी के साथ पीसकर पेस्ट बनाएं। नाभी पर और उसके आस-पास यह पेस्ट लगाए।

-अजवाइन को तवे पर सेक लें और काले नमक के साथ पीसकर पाउडर बनाएं। 2-3 ग्राम गर्म पानी के साथ दिन में 3 बार लेने से पेट का दर्द दूर होता है।

-जीरे को तवे पर सेकें और 2-3 ग्राम की मात्रा गर्म पानी के साथ दिन में 3 बार लें। इसे चबाकर खाने से भी लाभ होता है।

-पुदिने और नींबू का रस एक-एक चम्मच लें। अब इसमें आधा चम्मच अदरक का रस और थोडा सा काला नमक मिलाकर उपयोग करें। दिन में 3 बार इस्तेमाल करें, पेट दर्द में आराम मिलेगा।

-सूखी अदरक मुंह में रखकर चूसने से भी पेट दर्द में राहत मिलती है।

-बिना दूध की चाय पीने से भी कुछ लोग पेट दर्द में आराम महसूस करते हैं।

-अदरक का रस नाभी स्थल पर लगाने और हल्की मालिश करने से पेट दर्द में लाभ होता है।

-अगर पेट दर्द एसिडीटी से हो रहा हो तो पानी में थोड़ा सा मीठा सोडा डालकर पीने से फ़ायदा होता है।

-पेट दर्द निवारक चूर्ण बनाएं। इसके लिए भुना हुआ जीरा, काली मिर्च, सौंठ, लहसुन, धनिया, हींग सूखी पुदीना पत्ती, सबकी बराबर मात्रा लेकर बारिक चूर्ण बनाएं। इसमें थोडा सा काला नमक भी मिलाएं। खाने के बाद एक चम्मच थोड़े से गर्म पानी के साथ लें। पेट दर्द में आशातीत लाभकारी है।

-एक चम्मच शुद्ध घी में हरे धनियें का रस मिलाकर लेने से पेट की व्याधि दूर होती है।

-अदरक का रस और अरंडी का तेल प्रत्येक एक-एक चम्म च मिलाकर दिन में 3 बार लेने से पेट दर्द दूर होता है।

-अदरक का रस एक चम्मच, नींबू का रस 2 चम्मच लेकर उसमें थोडी सी शक्कदर मिलाकर प्रयोग करें। पेट दर्द में लाभ होगा। दिन में 2-3 बार ले सकते हैं।

-अनार पेट दर्द मे फायदेमंद है। अनार के बीज निकालें। थोडी मात्रा में नमक और काली मिर्च का पाउडर डालें। और दिन में दो बार लेते रहें।

-मेथी के बीज पानी में भिगोएं। पीसकर पेस्ट बनाएं। और इस पेस्ट को 200 ग्राम दही में मिलाकर दिन में दो बार लेने से पेट के विकार नष्ट होते हैं।

-इसबगोल के बीज दूध में 4 घटे भिगोएं। रात को सोते समय लेते रहने से पेट में मरोड का दर्द और पेचिश ठीक होती है।

-सौंफ में पेट का दर्द दूर करने के गुण होते है। 15 ग्राम सौंफ रात भर एक गिलास पानी में भिगोएं। छानकर सुबह खाली पेट पीयें। बहुत गुणकारी उपचार है।

-आयुर्वेद के अनुसार हींग दर्द निवारक और पित्तव‌र्द्धक होती है। छाती और पेट दर्द में हींग का सेवन बेहद लाभकारी होता है। छोटे बच्चों के पेट में दर्द होने पर एकदम थोड़ी सी हींग को एक चम्मच पानी में घोलकर पका लें। फिर बच्चे की नाभि के चारों लगा दें। कुछ देर बाद दर्द दूर हो जाता है।

-नींबू के रस में काला नमक, जीरा, अजवायन चूर्ण मिलाकर दिन में तीन बार पीने से पेट दर्द से आराम मिलता है। 



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Paint Scratch Hardness : This is a test method for determining the resistance of a paint film to penetration by scratching with a needle


Box Compression Tester : This tester is used for testing the compression strength testing for big size box up to less then 1 mtr cube . With, it’s also available to test the column compress strength of the corrugated  box, plastic container, tin container etc.
Bursting Machine : This Equipment under takes testing to establish burst strength charactrics particular for papers and other similar medias and the result are shown in Kg/Cm2
Gsm Round Cutter : FEC GSM Round Cutters use a drawing action to cut accurate circular samples with smooth edge. Even difficult material as card board, filter paper, Craft paper, corrugated sheet, fine knit, thin film, synthetic leather, can be cut conveniently.
Deep Freezer -40 Degree : The ultra low temperature freezers are equipped with special air cooled compressor and filled with specialized gas CFC free give the efficient cooling and flow in the cabinet.

Friday, 7 December 2012

कम वसामुक्त भोजन रखेगा आपको पतला


अगर आप अपने मोटापा को घटाने के लिए रात दिन मशक्कत करते है। इसके बावजूद मनमाफिक परिणाम नहीं मिल रहे हैं तो यह खबर आपके लिए है। अपने खानपान में वसायुक्त खाद्य पदार्थो की जगह कम वसायुक्त

चीजों को शामिल करें इससे दुबला होने में मदद मिलेगी। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) समर्थित एक शोध में यह बात कही गई है।

अमेरिका, यूरोप व न्यूजीलैंड में 73,589 लोगों पर किए गए 33 परीक्षण में पता चला है कि कम वसायुक्त भोजन खाने से लोगों को 3.5 पाउंड वजन कम करने में मदद मिलती है। शोधकर्ताओं ने कहा कि शोध के परिणाम पहली बार साबित करते हैं कि बिना अधिक मशक्कत के भी लोग अपना वजन कम कर सकते हैं। प्रमुख शोधकर्ता यूर्निवसिटी ऑफ ईस्ट एंजेलिया मेडिकल स्कूल की ली हूपर ने कहा कि जब लोग कम वसा वाला भोजन खाते हैं तो उनकावजन घटता है।

शोध के दौरान उन लोगों पर ध्यान केंद्रित किया गया जो अपने खानपान में वसा की कटौती कर रहे थे, लेकिन उनका लक्ष्य वजन को कम करना नहीं था। इसलिए वे सामान्य भोजन खा रहे थे। हूपर ने कहा कि आश्चर्यजनक बात यह थी कि उनका वजन कम हुआ और उनकी कमर पतली हुई। शोधकर्ताओं ने बताया कि डब्ल्यूएचओ के न्यूट्रीशन गाइडेंस एक्सपर्ट एडवाइजरी ग्रुप से वसा के सेवन पर दिशा-निर्देशों को अपडेट करने के आग्रह के बाद

उसने शोध की समीक्षा की। अब डब्ल्यूएचओ वैश्रि्वक स्तर पर इसकी सिफारिश करेगा। मोटापे के कारण कई बीमारियों जैसे कैंसर, स्ट्रोक और दिल संबंधी अन्य बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। इसके कारण दुनियाभर में हर साल करीब 17 लाख लोगों की मौत हो जाती है।



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