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Sunday, 16 September 2012

हल्दी बचा सकती है दिल के दौरे से

खाने को ज़ायकेदार रंग देने और खूबसूरती को निखारने के लिए इस्तेमाल होने वाली हल्दी अब आपके दिल की भी हिफाजत कर सकती है |

एक अध्ययन से संकेत मिले हैं कि बायपास सर्जरी कराने वाले हृदय रोगियों के लिए हल्दी बहुत फायदेमंद साबित हो सकती है और दिल के दौरे से बचा सकती है |

बायपास सर्जरी के दौरान रक्त प्रवाह की कमी के चलते हृदय की मांसपेशियों को नुकसान हो सकता है, जिससे मरीज को दिल का दौरा पड़ने की आशंका बढ़ जाती है.

हल्दी में कई ऐसे तत्व पाए जाते हैं जो इन खतरों का मुकाबला करने में मददगार साबित होते हैं. समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार अमरीका के ह्यूस्टन में स्थित एंडरसन कैंसर रिसर्च सेंटर के भरत अग्रवाल ने इसे बहुत ही उत्साहजनक शोध बताया है.

'दौरे का खतरा 65 फीसदी कम'
यह शोध थाईलैंड के चियांग माई विश्वविद्यालय में हुआ जिसमें 2009 से 2011 के बीच बाइपास सर्जरी कराने वाले 121 लोगों ने हिस्सा लिया.

इनमें से आधे लोगों को दिन में चार बार एक ग्राम हल्दी के तत्व से बने कैप्सूल दिए गए जबकि बाकी लोगों को दूसरे कैप्सूल दिए गए. ये कैप्सूल सर्जरी होने से तीन दिन पहले और सर्जरी होने के पांच दिन बाद तक दिए गए. 'अमेरिकन जनरल ऑफ कार्डियोलॉजी' में छपे इस शोध के नतीजों के मुताबिक ऑपरेशन के बाद अस्पताल में रहने के दौरान हल्दी का कैप्सूल लेने वालों में दिल का दौरा पड़ने की आशंका 13 प्रतिशत थी जबकि दूसरे कैप्सूल लेने वालों में यह आशंका 30 प्रतिशत के आसपास पाई गई.

यह शोध करने वाले टीम के प्रमुख डॉक्टर वारवारंग वांगचेरोन का कहना है कि हल्दी से बने कैप्सूल लेने वालों में दिल के दौरे का खतरा 65 फीसदी कम पाया गया. हालांकि यह शोध हृदय रोगियों के छोटे से समूह पर किया गया और जानकारों का मानना है कि अभी और व्यापक शोध करने होंगे


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Monday, 10 September 2012

आंखो के दर्द से कैसे पाएं मुक्ति


  • बचपन में बेलमिरी के बीज की मिंगी शहद में मिलाकर चटाने से जीनवभर आंखे नहीं दुखती। 
  • नींबू के रस की एक बूंद महीने में एक बार आंखों में डालने से कभी आंखे नहीं दुखती। 
  • तिल के 5 ताजे फूल प्रातःकाल अप्रैल माह में निगलें। इससे पूरे वर्ष आंखे नहीं दुखेंगी। 
  • चैत्र के महीने में गोरखमुंडी के 5 या 7 ताजे फूल चबाकर पानी के साथ सेवन करने से आंखों की ज्योति बढ़ती है। 
  • रूई के फाऐ को ठंडे पानी में भिगोर शुद्ध घी लगाकर आंखो के दर्द में लाभ मिलता है। 
  • हरी दूब पीसकर उसका रस आंखो के उपर लेप करने से दर्द मिटता है। 

Wednesday, 5 September 2012

नाभि स्पंदन से रोग की पहचान


आयुर्वेद एवं प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति में  रोग पहचानने के कई तरीके हैं। नाभि स्पंदन के रोग की पहचान का उल्लेख हमें हमारे आयुर्वेद व प्राकृतिक उपचार चिकित्सा पद्धतियों में मिल जाता है। परंतु इसे दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि हम हमारी अमूल्य धरोहर को न संभाल सके। 

कैसे होती है नाभि स्पंदन से रोगों की पहचान 
यदि नाभि का स्पंदन ऊपर की तरफ चल रहा है यानी छाती की तरफ तो अग्न्याष्य खराब होने लगाता है। इससे फेफड़ों पर गलत प्रभाव होता है। मधुमेह, अस्थमा, ब्रोंकाइटिस जैसी बीमारियों होने लगती है। यदि यह स्पंदन नीचे की तरफ चली जाये जो पतले दस्त होने लगते है। बाई ओ खिसकने से शीतलता की कमी होने लगती हैए सर्दी-जुकामए खांसी, कफजनित रोग जल्दी-जल्दी होते हैं। 

यदि यह ज्यादा दिनों तक रहेगी तो स्थायी रूप से बीमारियाँ घर कर लेती हैं। दाहिनी तरफ हटने पर लीवर खराब होकर मंदाग्नि हो सकती है। पित्ताधिक्य, एसिड, जलन आदि की शिकायतें होने लगती है। इससे सूर्य चक्र निष्प्रभावी हो जाता है। गर्मी-सर्दी का संतुलन शरीर में बिगड़ जाता है। मंदाग्नि, अपच, अफरा, जैसी बीमारियाँ होने लगती है। यदि नाफि पेट पर ऊपर आ जाए यानि रीढ़ के विपरित, तो मोटापा हो जाता है। यदि नाभि नीचे की ओर (रीढ़ की हड्डी की तरफ) चली जाए तो व्यक्ति कुछ भी खाए, वह दुबला होता चला जाएगा। नाभि के खिसकने से मानसिक एवं आध्यात्मिक क्षमताएं कम हो जाती है। नाभि का पाताल लोक भी कहा गया है। कहते है मृत्यु के बाद भी प्राण नाभि में छः मिनट तक रहते है। यदि नाभि ठीक मध्यमा स्तर के बीच में चलती है तब स्त्रियाँ गर्भधारण योग्य होती है। यदि यही मध्यमा स्तर से खिसकर नीचे रीढ़ की तरफ चली जाए तो स्त्रियाँ गर्भधारण नहीं कर सकतीं। 

अकसर यदि बिल्कुल नीचे रीढ़ की तरफ चली जाती है तो फैलापियन टयूब नहीं खुलती और इस कारण  स्त्रियाँ गर्भधारण नहीं रह सकतीं। कई बंध्या स्त्रियों  पर प्रयोग कर नाभि का मध्यमा स्तर पर लाया गया। इससे बंध्या स्त्रियाँ भी गर्भधारण योग्य हो गई। कुछ मामलों में उपचार वर्षों से चल रहा था एवं चिकित्सकों ने यह कह दिया था कि यह गर्भधारण नहीं कर सकती किन्तु नाभि-चिकित्सा के जानकारों ने इलाज किया। उपचार पद्धति आयुर्वेद व प्राकृतिक चिकित्सा पद्धतियों में पूर्व से ही विद्यमान रही है। नाभि को यथास्थान लाना एक कठिन कार्य है। थोड़ी-सी गड़गड़ी किसी नई बीमारी को जन्म दे सकती है। नाभि-नाडि़योंका संबंध शरीर के आंतरिक अंगों की सूचना प्रणाली से होता है।  

यदि गलत जगह पर खिसक जाए व स्थायी हो जाये तो परिणाम अत्याधिक खराब हो सकता है। इसलिए नाभि नाड़ी को यथास्थान  बैठने के लिए योग्य व जानकार चिकित्सकों का ही सहारा लिया जाना चाहिए। नाभि को यथास्थान लाने के लिए रोगी को रात्रि में कुछ खाने को न दें। सुबह खाला पेट उपचार के लिए जाना चाहिए। क्योंकि खाली पेट ही नाभि नाड़ी की स्थिति का पता लग सकता है।



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