Monday, 4 March 2013

पोलियो के कारण एवं लक्षण

पोलियो एक संक्रमण है जो जंगली पोलियो वायरस के कारण होता है। पोलियो वायरस 3 प्रकार के होते हैं जो किसी आदमी में संक्रमण का कारण बनते हैं। वे तीनो हैं: प्रकार 1, 2 और 3। इसका संक्रमण एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को फेको -मौखिक मार्ग के द्वारा फैलता है। ज्यादातर लोग (लगभग 90% लोग) जब अपने मल बाहर निष्काषित करते हैं तो उनके मल वायरस से संक्रमित रहते हैं लेकिन वे व्यक्ति खुद बीमार नहीं रहते हैं। जब इसका संक्रमण होता है तो 5-10% लोगों में इसके लक्षण उभरते हैं। अधिकांश रोगी सड़न रोकनेवाला मैनिंजाइटिस, हल्के बुखार, गले में ख़राश, पेट दर्द और उल्टी से पीड़ित होते हैं। संक्रमित लोगों में पोलियो के कारण लकवा कम से कम 1% में होता

पोलियो बहुत ही संक्रामक रोग है जो कि पोलियो विषाणु से छोटे बच्‍चों मे होता है। जिस अंग में यह बीमारी होती है वह काम करना बंद कर देता है। यह एक लाइलाज बीमारी है।



पोलियो की गंभीरता इसके लक्षणों पर आधारित रहती  है:
स्पर्शोन्मुख  : ज्यादातर लोग (लगभग  (90% लोग , जो पोलियो वायरस से संक्रमित रहते हैं वे  स्पर्शोन्मुख या बीमार नहीं रहते।   अध्ययन के अनुसार स्पर्शोन्मुख बीमारी और लकवे की बीमारी के बीच का अनुपात  50-1000:1 होता है (सामान्य 200:1 होता है)

मामूली, गैर विशिष्ट: लगभग 4% से 8% लोगों को  मामूली या गैर विशिष्ट बीमारी होती है। इसके  लक्षण अन्य वायरल बीमारियों से अप्रभेद्य हो सकते हैं







 जिनका वर्गीकरण निम्न  रूप में किया जा सकता है:

  •      ऊपरी श्वास पथ में संक्रमण: इस प्रकार के मामले में रोगी के गले में ख़राश और बुखार हो सकता है।
  •     गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल संक्रमण :  इस समस्या में  मिचली, उल्टी, पेट दर्द और कभी कभी  कब्ज या दस्त के लक्षण दिख सकते हैं।
  •     फ्लू जैसी बीमारी हो सकती है।

निम्न प्रकार के रोगी आमतौर पर एक सप्ताह में ठीक हो जाते हैं आर ऐसे लोगों का  केंद्रीय तंत्रिका तंत्र प्रभावित या संक्रमित होने से बच जाता है।


एसेप्टिक मेनिन्गितिस जो लकवाग्रस्त नहीं हैं: : लगभग  1 से 2% रोगियों बिना लकवा के एसेप्टिक मेनिन्गितिस से ग्रस्त होते हैं।  मरीज को शुरू में गैर विशिष्ट प्रोड्रोम हो सकता है उसके बाद  गर्दन, पीठ या पैरों में जकड़न हो सकता है। ये सब  लक्षण 2 से 10 दिनों तक रह सकते हैं उसके बाद मरीज को पूरी तरह आराम मिल जाता है।

झूलता हुआ पक्षाघात:  पोलियो संक्रमण के रोगियों में से सिर्फ  <1% हीं फ्लेसीड पक्षाघात के शिकार होते हैं।  शुरुआत में  मरीज को गैर विशिष्ट प्रोड्रोमल लक्षण हो सकते हैं जिनके बाद पक्षाघात के लक्षण उभरने लगते हैं।  पक्षाघात आम तौर पर 2 से अधिक 3 दिनों तक प्रगति करता जाता है और एक बार बुखार नियंत्रित हो जाने पर वह स्थिर हो जाता है। पक्षाघात पोलियो के साथ रोगियों में;
पारालाईटिक   पोलिओ के लगभग  50% रोगी पूरी तरह से ठीक हो सकते हैं और फिर उनमें किसी भी तरह का अवशिष्ट लकवा का अंश नहीं रह जाता।
लगभग 25% रोगियों में  हल्के रूप का स्थायी पक्षाघात और विकलांगता हो सकता है।
और लगभग 25% रोगियों को गंभीर रूप से स्थायी विकलांगता और  पक्षाघात हो सकता है।

झोले के मारे पोलियो से ग्रस्त बच्चों की मृत्यु  की दर 2% से 5% के बीच में रहती है। वयस्कों में मृत्यु दर बहुत अधिक रहती  है जो 15% से  30% तक जा सकती है


भारतीय बोझ

ज्यादा दिन पहले की बात नहीं है, 1998 को हीं ले लीजिये; उस समय तक दुनिया भर में 125 से भी ज्यादा देश पोलियो के लिए स्थानिकमारी वाले देश थे यानि वहां पोलिओ के मरीज पाए जाते थे।  इस अवधि में 1000 से भी अधिक बच्चे रोजाना पक्षाघात के शिकार होते रहते थे।  लेकिन उसके बाद व्यापक रूप से पोलियो उन्मूलन का कार्य चलता रहा जिसकी वजह से लगभग 100 से भी अधिक देशों में पोलिओ के संचरण को बाधित कर दिया गया यानि कि इसके फैलने पर नियंत्रण पा लिया गया।   2004 के मध्य से केवल छह देशों में हीं जंगली पोलिओ रह गया। वे छह देश हैं:  नाइजीरिया, पाकिस्तान, भारत, नाइजर, अफगानिस्तान और मिस्र।

हालांकि भारत से पोलियो उन्मूलन के कई उपाय किये गए हैं फिर भी यह कई जगह विराजमान है। भारत में पोलियो के ज्यादातर मामले उत्तर प्रदेश और बिहार में पाए जाते हैं।
अक्टूबर 2009  तक उत्तर प्रदेश और बिहार से पोलिओ के 464 मामले प्रकाश में आये थे।  उत्तर प्रदेश के 80% मामले पश्चिमी भाग के 10 जिलों पाए गए थे और बिहार के कोसी नदी के पास वाले क्षेत्रों में से ( 6 जिलों में से) 85% मामले पाए गए थे।
वर्तमान में  भारत में पोलियो के सबसे ज्यादा  कारण टाइप 1 और टाइप 3 वायरस के कारण होते हैं।  । 2009 में, पोलियो के ज्यादातर मामले (66 प्रतिशत पोलिओ के मामले )  दो साल से कम उम्र के बच्चों में पाए गए।

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Sunday, 3 March 2013

फल-सब्जियां बचाएंगी कैंसर से


रविशंकर तिवारी/एसएनबी नई दिल्ली। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान पूसा ने कुछ रोग प्रतिरोधक शाक-सब्जियां विकसित की हैं। इन सब्जियों के सेवन से कैंसर जैसी खतरनाक बीमारी होने की आशंका कम होती है। साथ ही यदि बीमारी हो गई है तो उससे लड़ने की क्षमता भी इनमें है। दो वर्ष पूर्व गोभी और गाजर की इन खास किस्म को परीक्षण के बाद अब किसानों को खेती के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। उत्तर भारत के मैदानी व पहाड़ी इलाकों में बेहतर खेती की उम्मीद जताई जा रही है। रंगीन शाक-सब्जियां सेहत के लिए फायदेमंद होती हैं। इनकी गुणवत्ता को और बेहतर बनाने के लिए पूसा के कृषि वैज्ञानिकों ने गाजर व गोभी की कुछ नई प्रजातियां विकसित की हैं, जो कैंसर जैसी खतरनाक बीमारी को रोकने में मददगार साबित हो सकती हैं।

पूसा ने हाल ही में गाजर की चार वेरायटी, पूसा असीता, पूसा रुधिरा, पूसा यमदागिनी और पूसा नवज्योति विकसित की है, जिनमें एंटी कैंसर ड्रग्स तत्व की बहुलता है। इसके अलावा गोभी की कुछ प्रजातियां जैसे पूसा ब्रोकली केटीएस-1, पूसा शरद, पूसा सुक्ति, पूसा स्नोबॉल के-1 व पूसा स्नोबॉल केटी-25 है। कैंसर प्रतिरोधक इन सब्जियों की खेती उत्तर भारत के किसानों ने शुरू कर दिया है। औषधीय उपयोगिता को देखते हुए कुछ लोग किचन गार्डन में भी गाजर व गोभी उगा रहे हैं। वि बाजार में भी इसकी मांग हैं। शाक-सब्जी विभाग के अध्यक्ष प्रो. प्रीतम कालिया ने बताया कि लाल, नारंगी और काले रंग की गाजर को विकसित किया गया है।

काले रंग की गाजर (पूसा असीता) में प्रचुर मात्रा में एंथासाइनीन पाया जाता है, जो शरीर में कोलेस्ट्राल को कम करता है। 100 ग्राम गाजर में 520 मिलीग्राम एंथासाइनीन की मात्रा है। पूसा यामदागिनी और पूसा नवज्योति का रंग नारंगी है, जिसमें बीटा कारोटिन और लाइकोपीन नामक औषधीय तत्व पाए जाते हैं, जो आंख की रोशनी के लिए फायदेमंद होता है। इस गाजर का लगातार सेवन करने वाले को लाइकोपीन नामक तत्व कैंसर से दूर रखता है। उन्होंने बताया कि क्रीम कलर वाले गाजर को विकसित करने के लिए काम चल रहा है। इस गाजर में ल्यूटिन की मात्रा सर्वाधिक होगी, जो एंटी कैंसर के लिए कारगर साबित होगी।

पूसा ने फूल गोभी व बंद गोभी की कुछ प्रजातियां विकसित की हैं, जिसमें ग्लूकोसाइलेट्स नामक तत्व पाए जाते हैं। पकाने के बाद सल्फरोफेन व इंडोथिन कार्बिनोल नामक तत्व की अधिकता हो जाती है। गोभी की इन किस्मों को सर्दी व गर्मी में भी पैदा किया जा सकता है। पूसा ब्रोकली सर्वाइकल कैंसर, फेफड़े का कैंसर, पेट का कैंसर और गले के कैंसर को होने से रोकता है। इसमें कैंसर से लड़ने की क्षमता होती है। पूसा चौलाई (लाल पत्तेदार शाक) और पूसा किरण (हरे पत्तेदार) में भी कैंसर प्रतिरोधक क्षमता है।

पूसा ने विकसित की कैंसर प्रतिरोधक शाक-सब्जियां पर विशेष

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Tuesday, 12 February 2013

स्वाइन फ्लू: सजगता से संभव है समाधान

उत्तर भारत के कई राज्यों में इन दिनों स्वाइन फ्लू का प्रकोप जारी है। अगर कुछ सजगताओं पर अमल किया जाए, तो इस रोग से बचा जा सकता है। समय रहते समुचित इलाज कराने से इस रोग को दुरुस्त किया जा सकता है..

स्वाइन फ्लू एक सक्रामक सास सबधी रोग है। यह रोग एच1एन1 वाइरस से होता है। यह वाइरस सक्रमित व्यक्ति के छींकने या खासते वक्त निकलने वाली दूषित सूक्ष्म बूंदों के साथ सास के जरिये शरीर में प्रवेश कर जाता है।

लक्षण

-स्वाइन फ्लू के लक्षण साधारण फ्लू के लक्षणों से मिलते-जुलते हैं।

-बुखार आना, खासी और गले में खराश।

-नाक का बहना।

-शरीर में दर्द,सिर दर्द, ठंड लगना और थकान महसूस करना।

-इसके अतिरिक्त मौसमी फ्लू की तुलना में स्वाइन फ्लू का हमला दस्त और उल्टी सरीखी गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल समस्याएं भी पैदा कर सकता है।


इन बातों पर दें ध्यान

दमा, मधुमेह और हृदय रोगों से ग्रस्त लोगों को अस्पताल में भर्ती करने की जरूरत कहीं ज्यादा होती है। ऐसा इसलिए, क्योंकि स्वाइन फ्लू के कारण उनके रोग की स्थिति और भी गभीर हो सकती है।

डॉक्टरों के लिये सबसे अधिक चिता का विषय गर्भवती महिलाएं हैं। जब उनके गर्भ में पल रहा शिशु बढ़ता है, तब उनके फेफड़ों की क्षमता कम हो जाती है। इस कारण जब उन पर स्वाइन फ्लू का हमला होता है तो उन्हें सास लेने में दिक्कत महसूस होती है। यही नहीं,गर्भवती महिलाओं में वाइरस से सबधित बीमारियों के होने की आशकाएं कहीं अधिक बढ़ जाती हैं।

बच्चों में तत्रिका तत्र से सबधित जटिलताएं जैसे बेहोशी, चिड़चिड़ापन या याददाश्त में कमी की समस्याएं पैदा हो सकती हैं, जबकि वयस्कों में अचानक चक्कर आना या भ्रम उत्पन्न होने जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं।

क्या करें तब, जब हो कोई बीमार

-जब परिवार का कोई सदस्य स्वाइन फ्लू से ग्रस्त हो जाता है, तो उसे अनिवार्य तौर पर घर के एक कमरे में अन्य लोगों से अलग रखा जाना चाहिए।

-घर के सभी लोगों को नियमित तौर पर अच्छी तरह से हाथ धोने चाहिए।

-इसके अलावा रोगी की सेवा करने वालों को हाथ धोने के मामले में खास सावधानी बरतनी चाहिए। उन्हें मुंह पर पूरी तरह से टाइट सर्जिकल मास्क लगाना चाहिए। सेवा करनेवाले व्यक्ति को रोगी के कपड़ों को धोने में खास सावधानी बरतनी चाहिए और उन्हें अपने शरीर से नहीं सटाना चाहिए।

-घर के फर्श को कीटनाशकों से नियमित रूप से साफ किया जाना चाहिए।

बचाव

सक्रमण फैलने से रोकने के लिये आपको छींकते या खासते समय अपने नाक और मुंह को टिश्यू पेपर या रूमाल से ढक लेना चाहिये। इस्तेमाल किये गये टिश्यू पेपर को फेंक देना चाहिए। आख,कान नाक और मुंह को छूने से बचना चाहिये ताकि दूषित चीजों से सक्रमण नहीं हो। स्वाइन फ्लू से ग्रस्त जिन लोगों की स्थिति गभीर नहीं है,उन्हें घर में रहना चाहिए। इस रोग से बचाव के लिए वैक्सीन भी उपलब्ध है, जिसे डॉक्टर के परामर्श से ही लगवाएं।

समुचित इलाज कराएं

कानपुर के वरिष्ठ सास रोग विशेषज्ञ डॉ. ए.के.सिह के अनुसार इस रोग की प्रमुख दवा टैमी फ्लू है। इसका इस्तेमाल डॉक्टर के परामर्श के बगैर नहींकरना चाहिए। कभी-कभी स्वाइन फ्लू के रोगी के निकट सपर्क में आने वाले लोगों पर भी इस दवा का इस्तेमाल किया जाता है।

डॉ.सिह की राय है कि स्वाइन फ्लू के लक्षणों के आधार पर यह बताना अत्यत कठिन है कि कि यह साधारण इंफ्लूएंजा है या फिर स्वाइन फ्लू। सिर्फ जाच के बाद ही यह निश्चित किया जा सकता है कि अमुक व्यक्ति स्वाइन फ्लू से ग्रस्त है। उनके अनुसार बुखार उतारने के लिए साधारण पैरासीटामॉल का प्रयोग किया जाना चाहिए। पेनकिलर्स और स्टेरायड्स दवाओं का इस्तेमाल न करें।

जाच: 'थ्रोट सिक्रीशन' की जाच से इस रोग के वाइरस एच1एन1 का पता चलता है।

इसलिए कहते हैं स्वाइन फ्लू

अंग्रेजी के स्वाइन शब्द का अर्थ सुअर होता है। शुरुआत में सुअरों में इस वाइरस के पाए जाने के कारण इसे स्वाइन फ्लू कहा जाने लगा। अनेक कारणों से कालातर में इस रोग का सक्रमण मनुष्यों में हुआ। अब यह रोग स्वाइन फ्लू से ग्रस्त किसी व्यक्ति के सपर्क में आने से दूसरे व्यक्तियों में फैल रहा है।

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Monday, 11 February 2013

ब्‍लैडर कैंसर क्‍या है

ब्लैडर में असामान्य कोशिकाओं की अनियंत्रित वृद्धि के कारण ब्लैडर का कैंसर होता है।

यह वो गुब्बारेनुमा अंग है जो यूरीन का संग्रह करता है और उसे निष्कासित करता है । ब्लैडर की आंतरिक दीवार नये बने यूरीन के सम्पर्क में आती है और इसे मूत्राशय की ऊपरी परत कहते हैं । यह ट्रांजि़शनल सेल्स/कोशिकाओं द्वारा घिरा होता है जिसे कि यूरोथीलियम कहते हैं । कोशिकाओं की परत के नीचे मांस पेशियों की एक परत होती है जो कि ब्लैडर के सिकुड़ने के साथ यूरीन को निष्कासित करती है जिससे यूरीन यूरेथ्रा नामक ट्यूब से निष्कासित किया जाता है । (एक तरफ ब्लैडर किडनी से यूरेटर नामक ट्यूब से यूरीन प्राप्त करता है)।


मांस पेशियों के ब्लैडर की बाहरी दीवार की परत को सेरोसा कहते हैं जो कि फैटी टिश्‍यू, एडिपोज़ टिश्यूज़ या लिम्फ नोड्स के बहुत पास होता है । ब्लैडर कैंसर ब्लैडर की परत से शुरू होता है । 70 से 80 प्रतिशत ब्लैडर कैंसर के मरीज़ों में कैंसर का पता तभी लग जाता है कि जबकि यह बाहरी सीमित होती है, बाहरी सतह में होती है और ब्लैडर की दीवार की आंतरिक सतह में होती है । कैंसर जब ब्लैडर की बाह्य दीवार में शुरू होता है तो इसे सुपरफीशियल कैंसर कहते हैं और यह असामान्य कोशिकाओं में पृथक धब्बे / आइसोलेटेड पैच की तरह दिखता है । अगर ब्लैडर की आंतरिक दीवार पर उंगलीनुमा निकला हुआ हिस्सा पाया गया तो इसे पैपिलरी ट्रांजिंशनल सेल कैंसर कहते हैं ।

कभी–कभी ट्यूमर का पता तब लगता है जबकि यह गहरे तौर पर ब्लैंडर की आंतरिक दीवार से लेकर लिम्फ नोड्स और दूसरे अंग में फैल चुका होता है ।

ब्‍लैडर कैंसर का एक और प्रकार है जिसे कि कारसिनोमा इन सीटू कहते हैं, जिसका अर्थ है कि यह कैंसर सिर्फ उसी स्थान पर रहता है जहां पर इसकी शुरूआत हुई होती है । हालांकि यह कैंसर ब्लैडर को बहुत गहराई से नहीं प्रभावित करता है लेकिन इसके कुछ लक्षण हैं जैसे यूरीनेशन के दौरान जलन होना । ऐसा भी हो सकता है कि चिकित्सक द्वारा साइटोस्कप से जांच करने के बाद भी यूरोलोजिस्ट इस बीमारी को ना पकड़ पाये । जांच के लिए ब्लैडर की बाह्य दीवार का जो हिस्सा लाल लगे वहां की बायोप्सी करनी होती है ।

इसका पता एक दूसरी जांच से भी लगाया जाता है जिसे कि यूरीन साइटालाजी कहते हैं और इसमें यूरीन की कोशिकाओं की जांच की जाती है । इस जांच में यूरीन का एक नमूना लिया जाता है और माइक्रोस्कोप के अंदर उसकी जांच कर कैंसर की कोशिकाओं का पता लगाया जाता है ।

ब्लैडर कैंसर के तीन प्रकार हैं और सभी में अलग– अलग तरह की कोशिकाएं होती हैं : लगभग 90 प्रतिशत ब्लैरडर के कैंसर ट्रांजि़शनल सेल कार्सिनोमाज़ कहलाते हैं, 6 से 8 प्रतिशत स्क्‍वामस सेल कार्सिनोमा और 2 प्रतिशत एडेनोकार्सिनोमाज़ होते हैं ।


अब तक ब्लैडर कैंसर के कारणों को सिर्फ आंशिक तौर पर ही समझा गया है । ऐसा अनुमान लगाया गया है कि ज्यादातर ट्रांजि़शनल सेल कार्सिनोमाज़ कार्सिनोजन (कैंसर के कारक पदार्थे) के कारण होते हैं जैसे तम्बाकू और वातावरण में मौजूद दूसरे रासायन । धूम्रपान करने वालों में ब्लैडर के कैंसर के होने की सम्भावना सामान्य व्यक्ति से दो से चार गुना अधिक होती है । हालांकि ऐसा भी पाया गया है कि ब्लैडर कैंसर के मरीज़ों में से सिर्फ आधे ही धूम्रपान करने वाले पाये गये हैं । ब्लै‍डर कैंसर औद्योगिक रासायनों के सम्पर्क में आने से भी हो सकता है । यह औद्योगिक कार्सिनोजन हैं एनिलीन डाई, पालीसाइकलिक एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन जैसे (2-नैपथिलामीन ,4- एमाइनोबाइफिनाइल या बेन्जि़डीन) पालीक्लोरीनेटेड बाइफेनाइल या वो रासायन जिनका प्रयोग एल्युमिनियम, रबर, रासायन और चमड़ा उद्योग के निर्माण में होता है और यहां तक कि यह रासायन ड्राइक्लीनर्स द्वारा, चिमनी से निकलनेवाले रासायन, हेयर ड्रेसर द्वारा, पेन्टर द्वारा, कपड़े का काम करने के दौरान और ट्रक चलानेवालों द्वारा भी वातावरण में मुक्त, किया जाता है ।

विकासशील देशों में, एक परजीवी संक्रमण जिसे कि सीज़ोसोमियासिस कहते हैं वो ब्लैडर कैंसर का खतरा बढ़ाता है । वो मरीज़ जिनमें लम्बे  समय से ब्लैडर की पथरी है उनमें ब्लैडर की दीवार पर सूजन और लम्बे समय तक जलन के कारण  कैंसर का खतरा बढ़ जाता है । वो मरीज़ जिनमें पहले कभी ब्लैडर कैंसर हो चुका है उनमें इस बीमारी के दोबारा होने की आशंका होती है । कैंसर की चिकित्सा के बाद आसपास की जगह में या ब्लैडर में या यूरेटर में (वह ट्यूब जो यूरीन को किडनी से ब्लैडर तक ले आता है)...

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Friday, 8 February 2013

हेल्दी रहना है तो दांतों की भी फिक्र करें

आज हम सभी अपने स्वा स्य्ों  को लेकर जागरूक हैं। सर्दी, जु़काम हो या सरदर्द हमें पता है कि इस स्थिसति में क्याक करना है। लेकिन मुंह स्वांस्य्ैं  को लेकर आज भी लोगों में जागरूकता की कमी है।  

डॅाक्टसर अपर्णा शर्मा का कहना है कि दांतों और मसूड़ों की समस्याजओं से बचने के लिए ब्रशिंग और फ्लॅासिंग के साथ चिकित्साक से मिलना ज़रूरी है। दिन में एक बार फ्लासिंग करें और सोने से पहले ब्रश ज़रूर करें।  

दांतों की सामान्य् समस्या एं:
•    दांतों में छेद : अधिक मीठा खाने पर या कई अन्यै कारणों से हमारे मुंह में मौजूद बैक्टीरिया एसिड पैदा करने लगते हैं, जिससे दांतों में छेद (कैविटीज़) हो जाती हैं। 
•    प्लॅााक और टारटर: प्लॅािक हर एक के दांतों में होता है। दांतों की सफाई करने के तुरंत बाद, प्लॅा क  का बनना शुरू हो जाता है। अगर इसे रोजाना अच्छी तरह से साफ  नहीं किया गया तो इसे कठोर टारटर में तब्दील होने में ज्यादा देर नहीं लगेगी।
•    जिंजिवाइटिस:यह मसूड़ों की बीमारी है, जिसमें मसूडें सूज जाते हैं या इनसे खून रिस सकता  है।
•    पेरिओडोन्टाल  रोग: यह मसूड़ों का गंभीर रोग है, जो दांतों से जुड़ी हड्डी तथा उसके आस-पास के उत्तको को भी नष्ट कर देता है।  

क्याप आप जानते हैं:
•    इनेमल शरीर का सबसे कठोर भाग होता है।  
•    हमारी जीभ जहां व्यंकजनों का स्वा्द लेने में हमारी मदद करती है वहीं यह चिकित्सगकों को हमारी बीमारी का भी पता देती है। 
•    हमारा मुंह किसी भी बीमारी को सबसे पहले दर्शाता है। 
•    मुंह के अंदर की रेखा को ‘ओरल म्यूरकोसा’ कहते हैं और इसका लाल या गुलाबी रंग का होना स्व स्थ  शरीर का संकेत देता है।

दांतों का स्वादस्य्ो   हमारे संपूर्ण स्वा’स्य्ैं  को प्रभावित कर सकता है और गंभीर बीमारियों को भी जन्मक दे सकता है, तो आज से ही सजग हो जायें।

Shakuntla Nursing Home & Hospital Are Pleased To Introduce Ourselves As One of The Ultra modern Nursing Home & Hospital Offering The Widest Range of Medical facilities. We provide Hospital in west delhi, Ecg service hospital, Women's health, Child health nursing home, Medical treatment, Stone removal, Urological solution & Specialist doctors.

Thursday, 7 February 2013

फ्लू से बचाव


इन्फ्लूएंजा के हमले से बचाव के लिए विकल्पों में हाल के वर्षों में तेजी से वृद्धि हुई है।

टीका

प्रत्येक वर्ष स्कूली आयु वर्ग के बच्चों सहित उन सभी लोगों को टीकाकरण की सलाह दी जाती है जो इन्फ्लूएंजा से बीमार होने या दूसरों को इन्फ्लूएंजा संचारण के जोखिम को कम करना चाहते हैं।

टीकाकरण की सलाह विशेष रूप जिन्हें दी जाती है वे हैं:

  • उम्र के 6 महीने से 18 साल की आयु वर्ग के सभी बच्चे और किशोर, खासकर वे जो दीर्घकालिक एस्पिरिन चिकित्सा करवा रहे हैं और इसलिए जिन्हें इन्फ्लूएंजा संक्रमण के बाद "रिये" सिंड्रोम से ग्रस्त होने का जोखिम हो सकता है 
  • वे सभी लोग जो 50 वर्ष की आयु अधिक के हैं; 
  • महिलायें जो गर्भवती हैं या इन्फ्लूएंजा के मौसम के दौरान गर्भवती होंगी;
  • वयस्क और बच्चे जिन्हें दीर्घकालिक फेफड़े के (अस्थमा सहित), हृदय (उच्च रक्तचाप को छोड़कर), गुर्दे, यकृत, रक्त या,  चयापचयी (मेटाबोलिक) विकार हैं (डायबिटीज मेलिटस सहित);
  • वयस्क और बच्चे जिनकी प्रतिरक्षा प्रणाली कमज़ोर है (इम्युनोसप्रैसिव दवाओं या ह्यूमन इम्यूनोडेफिशिएन्सी वायरस की वजह से);
  • वयस्क और बच्चे जो किसी भी ऐसी हालत में (जैसे, संज्ञानात्मक दुष्क्रिया, स्पाइनल कॉर्ड की चोटें, जब्ती विकार, और अन्य न्युरोमस्कुलर विकार) हैं जिससे फेफड़ों की कार्यक्षमता या श्वसन स्रावों के संचालन की प्रक्रिया आहत हो सकती है या जीवन के लिए खतरा बढ़ सकता है;
  • नर्सिंग होम और अन्य पुरानी देखभाल सुविधाओं के निवासी;
  • स्वास्थ्य सेवा कर्मचारी;
  • वयस्कों या बच्चे जो कम से कम 5 वर्षों (विशेष रूप से 6 माह से कम आयु वर्ग के बच्चे) के आयु वर्ग के बच्चों और 50 वर्ष से अधिक आयु के वयस्कों के साथ निकट संपर्क में हैं;
  • वयस्क या बच्चे जो उन लोगों के साथ निकट संपर्क में हैं जो चिकित्सा की उस स्थिति में हैं जो उन्हें इन्फ्लूएंजा की गंभीर जटिलताओं के उच्च जोखिम में डालती हैं;
  • फ्लू के मानक टीके 65 वर्ष की कम आयु के स्वस्थ लोगों में, बीमारी से बचाव या इसकी गंभीरता को कम करने में 70% से 90% तक प्रभावी है। अधिकतम प्रभावशीलता के लिए, डॉक्टर लोगों को अक्टूबर या नवंबर, जो कि फ्लू के मौसम का प्रारंभ होता है, में टीकाकरण की सलाह देते हैं।


2 और 49 के बीच के आयुवर्ग के स्वस्थ लोगों के लिए फ्लू शॉट के लिए एक अन्य विकल्प है। फ्लूमिस्ट एक अन्त्र्नासिकीय  टीके का स्प्रे है जो कि समान संरक्षण प्रदान करता है। इसमें, शॉट में मारे गए वायरस के बजाय एक जीवित निष्क्रिय वायरस का उपयोग होता है। फ्लूमिस्ट किसी भी तरह मानक फ्लू शॉट से अधिक प्रभावी नहीं है। क्योंकि फ्लूमिस्ट इतना नया है इसलिए फ्लू के उच्चतम जोखिम वाले लोगों (49 वर्ष से अधिक आयु के लोग और क्रोनिक स्वास्थ्य स्थितियों वाले लोग) को वैक्सीन इंजेक्शन के रूप में लेनी चाहिए।

स्वच्छता

वायरस आमतौर पर खांसी द्वारा हवा के माध्यम से पारित होता है। यह सीधे संपर्क जैसे हाथ मिलाने या चुंबन से भी पारित होता है। इसी कारण से स्वच्छता आदतों जैसे खांसते हुए मुंह को ढकना और नियमित हाथ धोना, के अभ्यास से आप फ्लू को स्वयं से दूर रखने और दूसरों में फैलाने से बच सकते हैं।

एंटीवायरल दवाएं

ज़नेमिविर (रिलेंज़ा) और ओजेल्टामिविर (टेमिफ्लू) को अगर संभावित संक्रमण से पहले ले लिया जाये तो फ्लू होने की संभावना को 70% से 90% तक कम किया जा सकता है। ज़नेमिविर एक स्प्रे है जिसे मुंह के माध्यम से साँस में छोड़ा जाता है। बाकी सब गोलियाँ हैं।

ऐमनटाडीन और रीमेंटाडीन जैसी पुरानी दवायें जो पहले इन्फ्लूएंजा रोकने के लिए इस्तेमाल जाती थीं, अब अपनी प्रभावशीलता को खो चुकी हैं लेकिन ज़नेमिविर और ओजेल्टामिविर, इन्फ्लूएंजा ए और बी के अधिकांश उपभेदों के विरुद्ध अब भी उपयोगी हैं

ज़नेमिविर नेबुलाइजर से साँस द्वारा दिया जाता है। इसे 5 और उसे अधिक उम्र में रोकथाम के लिए और 7 और उससे अधिक उम्र में इलाज के लिए स्वीकृति प्राप्त है। इसके दुष्प्रभावों में मिचली आना, उल्टी और घरघराहट जो कि विशेष रूप से अस्थमा या क्रोनिक फेफड़ों की बीमारी में होता है, शामिल है।

ओजेल्टामिविर गोली के रूप में उपलब्ध है। इसे एक साल से अधिक आयु के रोगियों में रोकथाम और उपचार के लिए स्वीकृत किया गया है। दुष्प्रभावों में मिचली और उल्टी आना शामिल हो सकता है।

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Wednesday, 6 February 2013

फाइलेरिया से बचाव


फाइलेरिया नियंत्रण के लिए उपाय निम्नानुसार हैं; 

  • जो लोग  फाइलेरिया रोग से संक्रमित है उनकी पहचान की जाये और उनके रक्त का उचित उपचार किया जाये ताकि उनसे यह रोग दूसरों को न फैले और।
  • मच्छर रोधी उपाय अपनाये जाएँ ।


राष्ट्रीय फाइलेरिया नियंत्रण कार्यक्रम; 

  • इस कार्यक्रम के अंतर्गत  सूक्ष्म कीड़े को मारने की दवाई दी जाती है जिससे कीड़ों के  पूरे समुदाय का खात्मा हो जाये।
  • इस कार्यक्रम के अंतर्गत ऐसे मच्छर विरोधी उपायों का उपयोग किया जाता है जिससे कि ग्रामीण क्षेत्रों और शहरी इलाकों में जो एंटीलार्वल  दवाओं का  साप्ताहिक अंतराल पर छिडकाव किया जा सके।  इन् उपायों में ऐसे कीटनाशक दवाओं का उपयोग शामिल किया गया है जिससे कि  मच्छरों के लार्वा, जैसे टेम्पेफोस , फ़ेन्थिओन इत्यादि को मारा जा सके। ऐसे गड्ढों को भी भरने का इंतजाम है जिससे कि  मच्छर के प्रजनन पर  नियंत्रण पाया जा सके। 
फाइलेरिया को रोकने का एक अन्य प्रमुख उपाय यह है कि  आप मच्छर के काटे जाने से बचें।  क्यूलेक्स मच्छर जिसके कारण फाइलेरिया का संक्रमण फैलता है आम तौर पर शाम और सुबह के वक्त काटता है।  यदि आप किसी ऐसे क्षेत्र में रहते हैं जहां फाइलेरिया फैला हुआ हो तो खुद को मच्छर के काटने से बचाएँ।  मच्छर के काटने से बचने के उपायों में निम्न उपाय शामिल हैं:


  • सुरक्षात्मक कपडे पहने; मसलन आपके पैंट एवं शर्ट ऐसे हो जिनसे आपका पूरा पाँव और बांह ढक जाए।
  • आवश्यकता पड़े तो  पेर्मेथ्रिन युक्त (पेर्मेथ्रिन एक आम सिंथेटिक रासायनिक कीटनाशक होता है) कपड़ों का उपयोग करें।  बाजार में पेर्मेथ्रिन युक्त कपडे मिलते हैं।
  • अगर जरूरत पड़े तो कीट विकर्षक का प्रयोग करें।   डी ई ई टी  नामक कीट विकर्षक तरल पदार्थ, लोशन और स्प्रेज़ के रूप में उपलब्ध रहता है । आपकी  त्वचा का जो खुला हुआ भाग रहता हो उसपर डी ई ई टी  नामक कीट विकर्षक लगायें।  आपको कितनी देर के लिए मच्छरों  से सुरक्षा चाहिए इस बात पर निर्भर करता है  कि आप कीट विकर्षक  डी ई ई टी  कितना गाढ़ा लेते हैं।  ज्यादा गाढ़ा डी ई ई टी   लगायेंगे तो आपको ज्यादा देर तक संरक्षण मिलेगी।
  • अगर आपके घर की खिडकियों में मच्छर रोकने की जाली नहीं लगी हुई हो तो उन्हें बंद रखें ताकि मच्छर अंदर प्रवेश नहीं कर सकें।
  • मच्छरों को मारने के लिए कीट स्प्रे से छिडकाव करें।

फाइलेरिया के कारण


भारत के अधिकांश भागों में फाइलेरिया एक ऐसे परजीवी के कारण होता है जिसे वुचेरेरिया   वानक्रोफ़टी के रूप में जाना जाता है।   इस तरह का संक्रमण भारत के  शहरी और ग्रामीण, दोनों क्षेत्रों में आम बात है। एक व्यक्ति से दूसरे तक यह रोग स्थानांतरित करने में क्यूलेक्स नामक मच्छर  रोगवाहक का काम करता है।  जो वयस्क परजीवी होता है वह छोटे और  अपरिपक्व माइक्रोफिलारे  को जन्म देता है और एक वयस्क परजीवी अपने 4-5 साल के जीवन काल में लाखों माइक्रोफिलारे   लार्वा पैदा करता है। माइक्रोफिलारे  आमतौर पर व्यक्ति के रक्त परिधीय  में रात में प्रसारित होता है।  यह बीमारी एक संक्रमित मच्छर क्यूलेक्स के काटने से फैलता है।  जब कोई क्यूलेक्स मच्छर एक संक्रमित व्यक्ति को काटता है तो उस व्यक्ति से माइक्रोफिलारे  उस मच्छर के शरीर में प्रवेश कर जाता है।  मच्छर के शरीर में  माइक्रोफिलारे  7-21 दिनों में विकसित होता है।  इसके बाद जब संक्रमित मच्छर किसी स्वस्थ व्यक्ति को काटता है तो उस व्यक्ति को भी यह रोग लग जाता है। 
एक अन्य परजीवी, जिसके  कारण फाइलेरिया होता है उसे  ब्रूगिया मलाई  कहा जाता है।  यह मानसोनिया  (मानसोनियोडिस) एनूलीफेरा  द्वारा फैलता है।  ब्रूगिया मलाई  का संक्रमण मुख्य रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में पाया जाता है।  डब्ल्यू वानक्रोफ़टी और बी मलाई   दोनों के माइक्रोफिलारे  के संक्रमण की प्रदर्शनी रात की अवधि में हीं अधिकांशतः होती है।

संक्रमित मच्छर के काटने के बाद फाइलेरिया को विकसित होने में आमतौर पर कई महीने या वर्ष लग जाते हैं। जिन  क्षेत्रों में  फाइलेरिया आम बात होती  है उन क्षेत्रों में ज्यादा  समय तक रहने से आपके संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है।  लेकिन जो पर्यटक अल्पकाल के लिए किस ऐसे क्षेत्र  का भ्रमण करते हैं जहाँ फाइलेरिया फैला हुआ होता है तो उतने कम समय में उन्हें इस रोग से ग्रसित होने का खतरा बहुत कम होता है।

फाइलेरिया के लक्षण


ज्यादातर लोगों को शुरू में पता हीं नहीं चल पाता है कि  वे लिंफ़ फाइलेरिया के शिकार हो गए हैं। फाइलेरिया कोई जानलेवा बीमारी तो नहीं है लेकिन इसके संक्रमण से लसीका प्रणाली और गुर्दों के स्थायी रूप से क्षतिग्रस्त होने का जोखिम रहता है।  प्रारंभिक चरणों में इस रोग के किसी लक्षण का पता हीं नहीं चलता और समस्याओं की शुरुआत तब  से होती है जब  वयस्क कीड़े मर जाते हैं।  जब इस रोग के शिकार व्यक्ति कि   लसीका प्रणाली क्षतिग्रस्त हो जाती है तब उस व्यक्ति की बाहों, स्तनों, और पैरों में द्रव संगृहीत होने लगता है जिसकी वजह से उन अंगों में सूजन आ जाती है। इस प्रकार की सूजन को  लिम्फेदेमा  कहा जाता है।  पुरुषों में वृषणकोश में सूजन हो सकती है।  इस प्रकार के सूजन को हाईड्रोशील कहा जाता है।  पैर, हाथ, या जननांग के क्षेत्र में सूजन पुरुषों के अपने सामान्य आकार से कई गुणा ज्यादा हो सकता है।

अंगों में सूजन होने से तथा लसीका प्रणाली के क्षतिग्रस्त होने से त्वचा और लसीका प्रणाली में जीवाणु के संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है।  बार बार  संक्रमण के हमले से रोगी की त्वचा  सख्त और मोटी हो जाती है जिसे  फ़ीलपाँव के रूप में जाना है।  फाइलेरिया के दुर्लभ अभिव्यक्तियों में उष्णकटिबंधीय फुफ्फुसीय एसनोफिला और चाईलुरिया  शामिल हैं। आमतौर पर फाइलेरिया के निदान के लिए जिस विधि का इस्तेमाल किया  जाता है उसमें परजीवी  का प्रत्यक्ष प्रदर्शन (लगभग हमेशा माइक्रोफिलारे  के रूप में) रक्त या त्वचा के नमूनों के ऊपर निर्धारित करना शामिल है।  चूँकि  माइक्रोफिलारे  में आवधिकता होती है इसलिए उसके रोगी के खून  का नमूना आमतौर पर रात में लिया जाता है।  फाइलेरिया के निदान  के अन्य जो परिक्षण  हैं उनमें इम्म्युनोडायग्नोस्टिक  एंटीबॉडी  परीक्षण तथा फाइलेरिया प्रतिजन (सी ऍफ़ ए) परिसंचारी की प्रक्रिया शामिल है। 

भारतीय बोझ

फाइलेरिया भारत के कई भागों में प्रचलित है और एक प्रमुख सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या के रूप में माना जाता है।  राष्ट्रीय फाइलेरिया नियंत्रण कार्यक्रम (एन ऍफ़ सी पी) 1955 में इस रोग पर नियंत्रण पाने के उद्देश्य के साथ शुरू किया गया था।
जो  राज्य फाइलेरिया से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं वे बिहार, केरल, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु हैं। फाइलेरिया के सबसे ज्यादा मामले भारत के बिहार राज्य में पाए जाते हैं (पूरे मामलों का 17% भाग बिहार में होते हैं)।  आंध्र प्रदेश, बिहार, केरल, उड़ीसा, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में भी यह रोग काफी हद तक फैला हुआ है और ये राज्य माइक्रोफिलारे  के वाहक का काम करते हैं तथा भारत में इस रोग के 97%  मामलों का कारण बनते हैं।
भारत में फाइलेरिया का संक्रमण फ़ैलाने का सबसे बड़ा कारण  डब्ल्यू वानक्रोफ़टी माना जाता है। देश में इस बीमारी का लगभग 98% भाग इसी की वजह से होता है जो राष्ट्रीय बोझ की तरह है ।  यह रोग महिलाओं की तुलना में  पुरुषों में अधिक पाया जाता है।
गोवा, लक्षद्वीप, मध्य प्रदेश और असम जैसे राज्य फाइलेरिया से बहुत कम प्रभावित हैं।
550  लाख से भी अधिक लोगों को फाइलेरिया होने का जोखिम है तथा 21 लाख लोगों में फाइलेरिया होने के लक्षण हैं और लगभग 27 लाख लोग फाइलेरिया के संक्रमण में वाहक का काम कर रहे हैं।

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