Thursday, 10 January 2013

ठंड में बच्चों की देखभाल


गिरते पारे और शीत लहर से बड़ों का बुरा हाल है तो नन्हे-मुन्नों का क्या होगा, इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। ऐसी ठंड में बच्चों का सामान्य सर्दी-जुकाम की चपेट में आ जाना स्वाभाविक है। ऐसे हालात में कुछ एहतियात और फौरी उपचार जरूरी हो जाते हैं।

बच्चे बड़ों की तरह एक जगह नहीं बैठते हैं इसलिए उन पर विशेष ध्यान देने की जरूरत होती है। सर्दियों में बच्चों को रोज नहलाने की जगह गर्म पानी में कपड़े को भीगोकर उनके शरीर को पोंछ दें। इससे उन्हें ठंड लगने की संभावना कम हो जाएगी।

अगर बच्चा तीन माह से कम का हो :

नाक से पानी आने लगे, धीरे-धीरे गाढ़ा होने के साथ इसका रंग पीला या हरा होने लगे तो तुरंत डाक्टर की मदद लेनी चाहिए, क्योंकि अगर जुकाम वायरस के कारण हो तो एंटीबायटिक भी उसमें मदद नहीं कर पाती।
नवजात शिशुओं में ये लक्षण बहुत कम समय में न्यूमोनिया या इस तरह की अन्य गंभीर बीमारियों में तब्दील हो जाते हैं।

अगर बच्चा थोड़ा ज्यादा उम्र का है और उसमें उपरोक्त लक्षण नजर आ रहे हैं तो अमूमन घर पर भी उपचार किया जा सकता है:


  • बच्चे की नाक में कोई ऐसा उपयुक्त तरल पदार्थ डालना चाहिए, जिससे उसकी बंद नाक खुल सके।
  • थोड़े-थोड़े अंतराल पर बच्चे को आहार देते रहें। अगर बच्चा स्तन पान करता है तो उसे जारी रखना चाहिए, क्योंकि मां का दूध जुकाम के लिए जिम्मेदार जीवाणुओं के प्रति सुरक्षा प्रदान करता है।
  • अगर नाक में बलगम ज्यादा मोटा हो गया हो तो रबर बल्ब सीरिंज की मदद ली जा सकती है। यह सीरिंज मेडिकल स्टोर पर आसानी से उपलब्ध होता है। इसके जरिए नाक से बलगम निकाला जा सकता है। 
  • बच्चों को कफ दबाने वाली और जुकाम से संबंधित अन्य दवाएं न दे तो ही बेहतर। 
  • सोने से कुछ मिनट पहले बच्चे को भाप दें। लाभ होगा।
  • बच्चे को बीमार लोगों से दूर रखें, खास कर शुरुआती मामले में। आम तौर पर जुकाम सांस से बाहर आने वाली कफ की बारीक बूंदों या छींक से फैलती है।

Saturday, 29 December 2012

एलोवेरा बनेगा किडनी का सुरक्षा कवच


वनस्पतियों में छिपे औषधीय गुणधर्म हजारों साल से जीवन को संजीवनी देते रहे हैं, लेकिन उनके अनुसंधान पर परिणामी काम नहीं हुआ। अंग्रेजी दवाओं की भेंट चढ़ती जिंदगी में फिर से जान फूंकने के लिए चिकित्सा जगत आयुर्वेद की शरण में खड़ा हैं। लाला लाजपत राय मेडिकल कॉलेज के फार्मोकोलोजी विभाग में गिलोय के बाद अब एलोवेरा पर चल रहे एक शोध में इसे किडनी रोगों पर अत्यंत लाभकारी पाया गया है।

चरक संहिता में भी एलोवेरा को औषधीय गुणों से लवरेज बताया गया है, किंतु वैज्ञानिक शोध पर आधारित पुष्टि की कमी रही। फार्मोकोलोजी विभाग की एमडी की छात्रा डॉ. शालिनी वीरानी ने चूहों पर किए गए एक शोध में पाया कि एलोवेरा के सेवन से एक माह में उनकी किडनी पूरी तरह ठीक हो गई।

इसके लिए चूहों को दो ग्रुप में बाटा गया। पहले ग्रुप में स्वस्थ चूहे, जबकि दूसरे में किडनी के रोगी चूहे रखे गए। स्वस्थ चूहों को लगातार एलोवेरा का डोज दिया गया, जिसके बाद उनमें किडनी रोग का संक्त्रमण नहीं लगा। जिन चूहों की किडनी फेल की गई थी, उन्हें एक माह तक एलोवेरा की खुराक ने पूरी तरह ठीक कर दिया। एलोवेरा की खुराक से चूहों के लीवर की क्षमता भी बढ़ी मिली।

महंगी डायलिसिस से मिलेगी निजात

किडनी रोगियों की संख्या बढ़ने से चिकित्सा के समक्ष एक कठिन चुनौती है। एलोपैथिक में किडनी रोगियों को डायलिसिस पर रखा जाता है, जो महंगा होने के साथ-साथ साइड इफेक्ट भी करता है। एलोवेरा से किडनी रोगों में चमत्कारिक सुधार के संकेत से अब विभाग ट्रायल का दूसरा चरण शुरू करेगा। बाद में इसके पेटेंट के लिए आवेदन किया जाएगा। 



Wednesday, 26 December 2012

कैसे जियें डायबिटीज के साथ


डायबिटीज आधुनिक जीवन शैली ऐसी देन है जिससे पीछा छुडाना बहुत मुश्किल रहता है, पर यदि आप सतर्क हो जाए तो डायबिटिज के साथ भी स्वस्थ रह सकते हैं। डायबिटीज को पूर्ण रूप से दूर नहीं कर सकते, लेकिन नियंत्रण में रखकर स्वस्थ एवं सामान्य जीवन बीता सकते है। जैसे ही आप को डायबिटिज के लक्षण दिखें तुरन्त अपनें सारे टेस्ट करवाएं, और इस पर नियंत्रण के लिए नियमित संतुलित आहार, व्यायाम और जरूरी सावधानियां लें। ताकि बीमारी बढ़ने से पहले ही कन्टोल कर ली जाएं। आइए हम आपको बताते है किन उपायों को अपनाकर आप भी डायबि‍टीज के साथ अच्छे से जी सकते है।

डायबि‍टीज के साथ स्वस्थ रहने के उपाय

  • अगर आपका वजन बढ़ा हुआ है तो सबसे पहले उसे नियंत्रित करें क्योंकि ज्यादा वजन डायबि‍टीज का सबसे बड़ा दुश्मन है।
  • रोजाना सुबह की आधे घंटे की वॉक, साइकलिंग, सीढ़ियों का प्रयोग, योग और एरोबिक्स आदि डायबिटीज को कन्टोल करने में सहायक हैं। इसे अपनी दिनचर्या में शमिल करें।
  • बिस्क-वाक नियमित करें ताकि आपकी मांसपेशियां इंसुलिन पैदा कर सकें और ग्लूकोस को पूरा एब्जार्ब कर सकें।
  • तनाव को अपने से दूर रखें।
  • ब्लडशुगर का लेवल अगर प्राकृतिक तरीके से या खानपान से कंट्रोल नहीं होता तो दवा का सहारा लें। समय-समय पर अपना चेकअप कराने में बिल्कुल भी लापरवाही न बरतें।
  • डायबिटीज होने पर डाइट चार्ट को फॉलो करें, हैल्दी लाइफ स्टाइल अपनाएं और अपने खानपान पर पूरा ध्यान दें।  
  • रेशायुक्त खाद्य पदार्थों की मात्रा अपने भोजन मे बढाए, जैसे ब्राउन राइस, चोकरयुक्त रोटी, ब्राउन ब्रेड आदि।
  • तली हुई चीजों का सेवन न करें, कम से कम वेजीटेबल ऑयल का प्रयोग करें। अपनी डाइट में चावल का सेवन कम और नट्स का प्रयोग नियमित रूप से करें।
  • नियमित रूप से भारतीय हर्बस जैसे मेथीदाना, करेला, नीम का पाउडर एटीआक्सीडेंट आंवले का सेवन किसी भी रूप में करें।
  • अगर आप इंसुलिन ले रहे हैं तो एक छोटा कप टोंड दूध (बिना चीनी के) रात में नियमित रूप से लें।
  • अगर थोड़ी-थोड़ी देर पर खाना नहीं लेते तो हाइपोग्लाइसेमिया होने की आशंका काफी बढ़ जाती है जिसमें शुगर 70 से भी कम हो जाती है।
  • खाना लगभग हर कुछ घंटे बाद लेते रहें। दिन भर में तीन बार खाने के बजाय थोड़ा-थोड़ा पॉच-छह बार खाएं। खाने में फाइबर ज्यादा ले।
  • सेब, संतरा, नाशपाती में से कोई भी फल लें। ध्यान रहे, मीठे फल यानी आम, केला, चीकू, अंगूर और लीची से परहेज करें।
  • स्मोकिंग से परहेज करें, स्मोकिंग करने वाले डायबिटीज रोगियों में हार्ट अटैक के 50 पर्सेंट चांस अधिक होते हैं क्योकि स्मोकिंग से रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचता है।


इन सब उपायों को अपनाकर डायबि‍टीज रोगी डायबिटीज के साथ भी स्वस्थ जीवन जी सकते है।




Sunday, 23 December 2012

सर्दी जुकाम से बचाव


आपकी जीवनशैली और आदतें कैसी भी हों कामन कोल्ड बहुत ही आम होने के कारण किसी भी मौसम में हो सकता है। इसलिए यह जानकारी थोड़ी अनोखी है कि कामन कोल्ड से निज़ात पाने का कोई शार्ट कट नहीं है चाहे आप कितनी भी दवाइयां या वैक्सीन लें।

कामन कोल्ड का संक्रमण थोड़ा डरावना होता है और इसके लक्षण जैसे खांसी, बुखार , सर्दी आपको दवाएं लेने के लिए प्रेरित करते हैं।

यह ध्यान देने योग्य बात है कि अगर आप कोई वैक्सीन नहीं ले रहे हैं तो आपको कामन कोल्ड के लक्षणों से बचना चाहिए। कामन कोल्ड से बचने के कुछ तरीके:

कामनकोल्ड से रोकथाम

हम सभी जानते हैं कि कामन कोल्ड संक्रमण से फैलने वाली बीमारी है और इसलिए ऐसे में हाथ धोना बहुत ज़रूरी है। समय समय पर हाथ धोना इसलिए भी ज़रूरी हो जाता है क्योंकि कामन कोल्ड से संक्रमित व्यक्ति के हाथों में अकसर वायरस चिपक जाते है जो फिर टेलिफोन, डेस्क, सेलफोन या डोरबेल पर चिपक जाते हैं। ऐसे कीटाणु स्वचालित तरीके से किसी दूसरे व्यक्ति में फैल सकते हैं।

पर्याप्त मात्रा में पेय लें:

कोल्ड जैसी परेशानी के समय पानी पीना थोड़ा मुश्किल होता है लेकिन पर्याप्त मात्रा में पानी पीने की कोशिश करें। विशेषज्ञों का ऐसा मानना है कि पानी से हमारा शरीर साफ हो जाता है और शरीर में मौजूद टाक्सिन निकल जाते हैं और रिहाइड्रेशन की क्रीया होती है ा चाय, काफी और सूप जैसे गरम आहार लेने से भी कोल्ड जैसी बीमारी से राहत मिलती है।

साफ और ताज़ा वायु लेना ज़रूरी है:

कामन कोल्ड से ग्रसित व्यक्ति के लिए घर की चारदीवारी के अंदर रहना समझदारी की बात है। लेकिन ऐसे में लोग यह भूल जाते हैं कि इस तरीके से कमरे के अंदर का नम माहौल कीटाणु के लिए स्टोरहाउस जैसा काम करता है। व्यक्ति को प्रतिदिन ताज़ी हवा लेना ज़रूरी होता है।

पेपेर की तौलिया का इस्तेमाल:

ऐसी सलाह दी जाती है कि हाथों को साफ करने के लिए किचन और बाथरूम में पेपर की तौलिया का इस्तेमाल करना चाहिए। घर में प्रत्येक सदस्य की अलग तौलिया होनी चाहिए जिससे कि कीटाणु ना फैलें।

बहुत ज़्यादा शराब पीने से प्रतीरक्षा प्रणाली का ह्रास:

विशेषज्ञ ऐसी सलाह देते हैं कि व्यक्ति को एक सीमित मात्रा मेंअल्कोहल का सेवन करना चाहिए क्योंकि इससे संक्रमण होने का अधिक खतरा रहता है। अल्कोहल शरीर में शुष्की पैदा करता है और इससे जर्मस आसानी से बढ़ जाते हैं।

अपने चेहरे को बार बार ना छूएं:

कोल्ड होने पर अपने चेहरे, नाक और मुंह को बार बार ना छूएं, क्‍योंकि ऐसे में अगर आपके आसपास किसी को कोल्ड हुआ हो तो आपको भी कोल्ड होने की सम्भावना बढ़ जाती है।

फाइटोकेमिकल्स फ्लू और कोल्ड से लड़ने में प्रभावी:

व्यक्ति को पर्याप्त मात्रा में कच्चे फल और सब्ज़ियां खानी चाहिए क्योंकि यह शरीर की प्रतीरक्षा प्रणाली के लिए अच्छे होते हैं। इसमें गहरे हरे, पीले और लाल रंग की सब्ज़ियां आती हैं जो कि हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली को साफ करती हैं।

Friday, 21 December 2012

समय रहते संभव है उपचार ब्रेन टयूमर


मस्तिष्क हमारे शरीर का वह महत्वपूर्ण और नाजुक हिस्सा है, जिसका संबंध संपूर्ण शरीर से है। अगर मस्तिष्क के किसी भी हिस्से में कोई तकलीफ हो तो उसका प्रभाव शरीर के दूसरे अंगों की गतिविधियों पर भी पड़ता है।  
आज के दौर में महानगरों में रहने वाले ज्यादातर लोग अति व्यस्तता की वजह से मानसिक तनाव और अवसाद के शिकार हो रहे हैं। साथ ही, आजकल ब्रेन टयूमर जैसी गंभीर बीमारियों के मामले भी देखने में आ रहे हैं। अत: सिरदर्द, चक्कर आना, आंखों के आगे अंधेरा छा जाना, जैसी समस्याओं को मामूली समझ कर अनदेखा करने के बजाय गंभीरता से लेना चाहिए। 
         
क्यों होता है ब्रेन ट्यूमर 

ब्रेन टयूमर क्यों होता है? इसकी वजह अभी तक पता नहीं चली है। तमाम खोजों और अध्ययनों के बाद भी यह हैरानी की बात है कि देश-विदेश के चिकित्सक अभी कोई पुख्ता वजह नहीं ढूंढ पाए हैं कि ब्रेन टयूमर क्यों होता है क्योंकि इसके होने की वजह ठोस रूप से सामने नहीं आई है। इसलिए इससे बचाव के उपाय बताने भी कठिन हैं। इस संबंध में दिल्ली स्थित विद्यासागर इंस्टीटयूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंसेज में गामा नाइफ विशेषज्ञ डॉ. महीप सिंह गौड़ कहते हैं, 'सिर में किसी भी तरह की तकलीफ या मस्तिष्क से जुड़ी किसी समस्या का आभास होने पर तुरंत विशेषज्ञ से संपर्क करें। बीमारी सही समय पर पकड़ में आए तभी निदान आसान हो पाता है।'

मस्तिष्क में मुख्यत: दो प्रकार के टयूमर होते हैं- पहला है बिनाइन टयूमर जो धीरे-धीरे बढ़ता है और दूसरा मेलिगेंट टयूमर, जो कैंसर युक्त होता है। पहले तरह के टयूमर कुछ दवाओं से नियंत्रित हो जाते हैं और जो दवाओं से ठीक नहीं हो पाते उन्हें ओपन सर्जरी और गामा नाइफ सर्जरी से ठीक करने की कोशिश की जाती है परंतु कैंसर युक्त टयूमर पूर्णतया ठीक होते हैं। टयूमर दिमाग में किस जगह पर है सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण यही बात है। डॉ. गौड़ का कहना है कि मस्तिष्क मानव शरीर का सबसे संवेदनशील भाग है। टयूमर उसमें कहां है किस नस को छू रहा है। किस हिस्से पर उसका कितना प्रभाव है, यह बात अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसी पर आधारित होकर मरीज का इलाज किया जाता है। सबको एक जैसा उपचार नहीं दिया जाता उपचार रोग की जटिलता पर निर्भर करता है। कभी-कभी कुछ टयूमर ऐसे होते हैं जहां तुरंत सर्जरी (शल्य चिकित्सा) कर बाद में गामा नाइफ सर्जरी भी करनी पड़ती है। 

ब्रेन टयूमर के लक्षण 


  • अभी तक ब्रेन ट्यूमर के कारणों का सही-सही पता नहीं चल पाया है। पर चिकित्सकों के अनुसार नीचे बताए गए लक्षणों में से अगर कोई भी लक्षण आपको दिखाई दे, तो तुरंत किसी न्यूरो सर्जन से संपर्क करें।
  • कभी-कभी मिरगी के दौरे के सामान दौरा पड़ता हो या बेहोशी आती हो। 
  • सिर में असहनीय दर्द होता हो। 
  • हाथ-पैरों में ऐंठन हो। 
  • ज्यादा कमजोरी का एहसास हो। 
  • सुबह के समय सिर में अक्सर दर्द होता हो। 
  • दृष्टि का अचानक कम होना या कलर ब्लांइडनेस। 


अब आसान है निदान 

दिल्ली स्थित विद्यासागर इंस्टीटयूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंसेज में गामा नाइफ विशेषज्ञ डॉ. महीप सिंह गौड़ का मानना कहते हैं, 'इस तरह के मामले ज्यादा सामने आने की मुख्य वजह है कि अब पहले की तुलना में परीक्षण आसान होने लगा है। कैट स्कैन और एमआरआई समय पर कराने से रोग सामने आने लगा है। पहले यह जांच और परीक्षण बड़े-बड़े शहरों और उनमें भी मुख्य अस्पतालों तक सीमित थे। आज उनका क्षेत्र व्यापक हुआ है। पहले तकलीफ होने पर दूर जाने और महंगे उपचार के डर से लोग कतराते थे चिकित्सक भी अपनी साख को बनाए रखने के लिए जल्दी महंगे टेस्ट कराने की सलाह नहीं देते थे। परंतु आज दिमाग से संबंधित किसी भी रोग का अंदेशा भर होने से चिकित्सक तुरंत विस्तृत जांच कराता है। डॉ. गौड़ का मानना है कि यही वजह है कि पहले जो बीमारी अपने विकराल रूप में सामने आती थी, अब वही छोटे रूप में ही सामने आ जाती है। इसीलिए इलाज पहले से ज्यादा आसान हो गया है। 




Monday, 17 December 2012

रक्त से स्टेम सेल बनाने की तकनीक खोजी


अब मरीज के गंभीर रोगों का इलाज उसी के खून से संभव हो सकेगा। यह कामयाबी मिलेगी रक्त को स्टेम सेल के रूप में विकसित करने की तकनीक से जिसे कैंब्रिज विश्‌र्र्वविद्यालय में कार्यरत गोरखपुर की बेटी इंबिशात गेती ने खोज निकाला है। रक्त से बनी कोशिकाओं का प्रयोग कर हृदय, दिमाग, आख, अस्थि आदि अंगों की बीमारियों का इलाज हो सकेगा।

गेती का शोध दुनिया के जाने-माने जर्नल स्टेम सेल्स ट्रास्लेशनल मेडिसिन में प्रकाशित हुआ है। शोध में रक्त से बनी स्टेम सेल्स का प्रयोग रक्त वाहिनिया बनाने में किया गया है। चिकित्सा विज्ञान में इसे बड़ी उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है। इंबिशात के मुताबिक इन स्टेम सेल्स की खासियत यह है कि वे अपने को शरीर के किसी भी अंग की कोशिकाओं के रूप में विकसित कर सकती हैं। इसी विशेषता के कारण ये हृदय, दिमाग, किडनी, नेत्र सहित किसी भी अंग की बीमारियों का इलाज करने में सक्षम हैं। शोध के समय गेती ने इस बात का भी ध्यान रखा है कि ये कोशिकाएं एक ऐसे रिपेयर सेल के रूप में काम करें जो रक्त के जरिये पहुंचकर रक्त वाहिनियों की मरम्मत कर सकें। इस शोध निष्कर्ष के बाद उन्हें स्टेम सेल के तौर पर विकसित किया गया है।

इंबिसात गेती ने बताया कि स्टेम सेल बनाने का सबसे आसान व सुलभ स्त्रोत मरीज का रक्त है। हमने इस तकनीक को आसान, सस्ता व जल्द पूरा होने वाला बनाने की कोशिश की है। इंबिशात ने गोरखपुर विश्‌र्र्वविद्यालय से बीएससी और बैंगलोर से एमएससी किया। इसके बाद कैंब्रिज विश्‌र्र्वविद्यालय ज्वाइन कर शोध कार्य शुरू किया। उनका शोध पत्र हाल ही में प्रकाशित हुआ है। शोध में 11 लोगों ने उनका सहयोग किया है। स्टेम सेल खुद को शरीर के किसी भी अंग की कोशिकाओं के रूप में विकसित कर सकती हैं। नए सेल्स का निर्माण भी कर सकती हैं।

कैसे बेहतर नई तकनीक

-स्टेम सेल्स कई तरह के होते हैं। इपिथियल स्टेम सेल्स त्वचा कोशिकाओं के रूप में विकसित किए जा सकते हैं।

-न्यूरो स्टेम सेल्स न्यूरो संबंधित रोगों के इलाज में कारगर हैं, पर यह दोनों स्टेम सेल्स सिर्फ उसी अंग के इलाज में कारगर हैं जहा से निकाले गए हैं।

-बड़ी उम्र के लोगों के अंगों से स्टेम सेल्स तैयार करने में दिक्कत है कि उन्हें अलग करना आसान नहीं होता, क्योंकि वे सीमित मात्रा में होते हैं।

-भ्रूण से बने स्टेम सेल्स हर तरह की कोशिकाएं बना सकते हैं लेकिन इससे इलाज में कई दिक्कतें भी हैं।

-भ्रूण हत्या से जुड़ी होने के कारण यह तकनीक विवादित है। साथ ही ऐसी कोशिकाओं को शरीर आसानी से स्वीकार नहीं कर पाता, जैसी दिक्कत अंग प्रत्यारोपण में आती है।

-स्टेम सेल का एक दूसरा जरिया मानव त्वचा है। इसे भी शरीर स्वीकार कर सकता है, पर त्वचा या अन्य अंगों से निकाली कोशिकाओं के लिए बायोप्सी करनी पड़ती हैं।

-ये सभी तरीके कठिन होने के साथ ही खर्चीले व अधिक समय लेने वाले हैं। रक्त से तैयार स्टेम सेल्स निकालने का तरीका आसान, कम खर्चीला व कारगर है। 

Friday, 14 December 2012

हृदयाघात के लक्षण (Heart Attack)


हृदय एक महत्वपूर्ण अंग है जो शरीर के विभिन्न हिस्सों में रक्त संचार करता है। हृदय,रक्त-धमनियों से ऑक्सीजन युक्त रक्त प्राप्त करता है, जिन्हें कोरोनरी आर्टरीज कहा जाता है,यदि इन रक्त धमनियों में रुकावट आ जाती है, तो हृदय की मांसपेशियों को रक्त नहीं मिल पाता है वे काम करना बंद कर देती है, इसे हृदयाघात कहते हैं। 

हृदयाघात की गम्भीरता हृदय की मांसपेशियों को नुकसान की मात्रा पर निर्भर करती है। मृत मांसपेशी, पम्पिंग प्रभाव को कमज़ोर कर हृदय के कार्य पर विपरीत प्रभाव डाल सकती है, जिससे कंजेस्टिव हार्ट फेल्यर होता है। यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें पीड़ित व्यक्ति को सांस लेने में कठिनाई महसूस होती है एवं उसके पैरों में पसीना आने लगता है।

हृदयाघात का सबसे सामान्य लक्षण है-छाती में दर्द, जिसमें प्रायः लगता है कि कोई कसकर छाती को दबा रहा है या यहां कुछ भारीपन महसूस होता है, कभी-कभी चुभन या जलन जैसा दर्द भी हो सकता है।

हालांकि यह दर्द कभी भी हो सकता है, बहुत सारे रोगियों को यह सुबह के समय, जगने के कुछ घंटे के भीतर महसूस होता है। छाती का दर्द या तो छाती के बीचोबीच या पसली-पंजर के केंद्र के ठीक नीचे महसूस होता है, औऱ बांह, पेट, गला औऱ निचले जबड़े तक फैल सकता है।

दूसरे लक्षण हैं-कमजोरी, पसीना आना, जी मिचलाना, उल्टी आना, सांस लेने में तकलीफ, चेतना में कमी, धड़कनें तेज होना, सोचने-समझने की क्षमता में कमी आदि हैं। कई बार हृदयाघात के कारण छाती में जलन, जी मिचलाने और उल्टियां आने पर रोगी इसे अपच की समस्या समझ लेते हैं।